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लोगों ने खराब काम बताया, रिक्शा खींचने से हाथों में छाले भी पड़े, अब महीने में कमाती हैं Rs.6 हजार तक

3 वर्ष पहले
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शहर में नवंबर 2017 से डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन शुरू हुआ। अब शहर के सभी वार्डों में सुबह 6 बजे से रिक्शा खींचती हरी साड़ी पहने स्वच्छता मित्र महिलाएं कचरा इकट्‌ठा करती हैं। शुरुआत में रिश्तेदारों, पड़ोसियों या समाज के लोगों ने ओछा काम बताकर मना किया लेकिन महिलाओं ने काम शुरू किया। ये काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं आर्थिक या पारिवारिक परेशानियों से जूझ रही थीं। ये कहती हैं कि इस काम में कोई हर्ज नहीं, शहर भी साफ हो रहा है और सम्मान के साथ उनका घर भी चल रहा है।

सुबह सीटी बजाकर घरों से कचरा इकट्‌ठा करने वाली महिलाओं में कोई विधवा है, कोई दुष्कर्म पीड़िता, तो कुछ ऐसी महिलाएं हैं जिनके परिवार को दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पाती थी। स्वच्छ भारत मिशन में जब नगरीय क्षेत्रों में डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन की योजना बनी। एसएलआरएम (सॉलिड लिक्विड रिसोर्स मैनेजमेंट, यहां कचरों की छंटाई होती है) सेंटर शुरू करने और शुरुआत में कुछ महिलाओं को काम पर रखकर वार्डों में कचरा कलेक्शन शुरू कराया गया था। महिलाएं कहती हैं कि उन्हें समाज में इज्जत जाने या बहिष्कार जैसी स्थिति बनने का डर दिखाया। परिवार की जरूरतों की पूरी करने की मजबूरी के साथ ही स्वच्छता अभियान से जुड़ने भावना से इन्होंने काम शुरू किया।

परिवार चलाने, बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे नहीं होते थे अब ज्यादातर सफाई कर्मी महिलाएं आत्मनिर्भर बन गई हैं

इस तरह से होती है कमाई

निगम की ओर से हर स्वच्छता मित्र के लिए 5 हजार रुपए प्रति माह फिक्स है। प्रतिमाह मिलने वाली राशि के अलावा ये हर दिन जो भी कचरा उठाकर लाती है उसकी छंटाई के बाद उसे बेचा जाता है। कचरा बेचकर जो कमाई होती है उसे निगम स्व सहायता समूह के बीच बांट देती है। इसी तरह महीने में मिलने वाली तनख्वाह के अलावा अतिरिक्त 1000 रुपए के आसपास इनकी कमाई हो जाती है। निगम के अधिकारी बताते हैं कि अभी मात्र 40 प्रतिशत कचरा ही सेंटरों तक पहुंच पा रहा है। इसकी मात्रा बढ़ने के साथ ही महिलाओं के आय का स्त्रोत भी बढ़ जाएगा।

ऐसे निबटाते हैं कचरा

4 एसएल आरएम सेंटर

196 कचरा कलेक्शन करने स्वच्छता मित्र

सुबह 6 से 2 बजे तक डोर टू डोर कचरा कलेक्शन, एसएल आरएम सेंटर में कचरे की छंटाई

शहर के 48 वार्ड में 34 हजार परिवार के घरों से उठता है कचरा

एक रिक्शे के जिम्मे 400 घर

हर रोज 51 टन कचरा पहुंचता है एसएलआरएम सेंटरों में

छंटाई के बाद कमाई का हिस्सा भी महिलाओं को

एक महिला को 5 हजार महीने और कचरा बेचकर हुई कमाई का हिस्सा

सुबह वार्ड में कचरा कलेक्ट करती स्वच्छता मित्र। सूखे कचरे को एसएलआरएम सेंटर में अलग करती महिलाएं।

आर्थिक स्थिति सुधर गई

सुकमेत चौहान.
काम की शुरुआत में थोड़ी परेशानी हुई जरूर लेकिन अब घर की आर्थिक स्थिति काफी सुधर गई है। किसी गरीब विधवा के लिए जीवन गुजारना मुश्किल होता है। इसी कारण मेरी बेटी और मैंने घर की जिम्मेदारी उठाई है। रिक्शा खींचने के काम में मेहनत भी बहुत है। शुरुआत में लोग मना करते थे, हाथों में छाले पड़ जाते थे लेकिन अब सब ठीक है।

कुछ फटकारते भी है

हर दिन कचरा कलेक्शन करने के दौरान काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। खासकर लोगों की भाषा ऐसी होती है जो पीड़ादायक होती है। सुबह कचरा उठाने जब जाते हैं तो कुछ लोग आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। स्वच्छता मित्र लोगों से गीला सूखा कचरा अलग करने के लिए कहती हैं कुछ लोग उन्हें फटकारते हैं।

बच्चों को तकलीफ न हो

रेखा देवी.
मैं अकेली हूं और बच्चों को पालना उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए काम करना ही है। समाज के लोगों ने इसे गंदा और घटिया काम बताया लेकिन ऐसा है नहीं, हम शहर से कचरा साफ कर रहे हैं और मेरा परिवार भी अच्छा चल रहा है। आय इतनी होती है कि किसी दूसरे सहारे की जरूरत नहीं है। बच्चों को इसके लिए काम नहीं करना पड़ेगा इसलिए खुश हूं।

सूखे कचरे में

कचरे को कैटेगरी के हिसाब से उसके बॉक्स में ही रखें।

यहां-वहां फेंकने की बजाए हर सुबह स्वच्छता मित्रों के रिक्शा में डालें या फिर डस्टबिन में डालकर आ जाएं।

नाली और खुले जगहों या प्लॉट पर कचरा फेंकने से बचें।

कचड़ा रास्ते पर न बिखेरें, बदबू से परेशानी आपको ही होगी।

कचरा ले जाकर स्वच्छता मित्र आपकी मदद कर रही हैं, व्यवहार अच्छा रखिए।

कपड़ा प्लास्टिक, कार्ड बोर्ड, गत्ता, लोहा, रबर, चमड़ा, रद्दी कागज, पॉलीथिन, बाल

अब खर्च का तनाव नहीं

मीना बसंत.
मेरे दो बेटे हंै। दोनों की पढ़ाई है और फिर परिवार का खर्च। ऐसे में केवल मेरे पति की कमाई से घर कैसे चल सकता था। काम की शुरुआत मैने दिसंबर माह से की है। आज रिक्शा भी खींचती हूं। कचरा कलेक्शन भी करती हूं और परिवार के साथ मिलकर रहती भी हूं। काम शुरू होने के बाद से अब हर माह फिलहाल घर के राशन के लिए तनाव मुक्त रहती हूं।

भटकना नहीं पड़ता है

मंगलीन बाई.
मजदूरी कर घर का गुजर-बसर करती थी। मजदूरी कभी-कभार ही मिल पाती थी और ज्यादा मेहनत की वजह से कई बार तबीयत भी खराब हो जाती थी। अब घर-घर जाकर कचरा कलेक्शन करती हूं। आठ घंटे की ड्यूटी करती हूं और शाम को घर के कामों के लिए समय भी निकल जाता है। हर माह पैसे के लिए किसी पर आश्रित भी नहीं रहना पड़ता।

गीले कचरे में ये

बचा हुआ भोजन, मांसाहार के बाद बोन और अन्य अवशेष, फलों व अंडे के छिलके, सब्जियों के छिलके, नैपी पैड्स आदि गीले कचरे की कैटेगरी में हैं। इसकी रिसाइक्लिंग नहीं हो पाती, इसके निबटारे से स्वच्छता मित्र महिलाओं को लाभ नहीं है।

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