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कचरा रखने 16-16 लाख रुपए से बनाए 23 सेंटर इनमें 10 बचे, मशीनों के लिए इनके भी शेड तोड़े

3 वर्ष पहले
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देश में शहरों के स्वच्छ शहरों में रायपुर की रैंकिंग का भले ही अता-पता नहीं है, लेकिन सफाई और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के नाम पर राजधानी में पिछले एक साल से जबर्दस्त धमाचौकड़ी चल रही है। अफसरों ने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट में अच्छे नंबर हासिल करने के लिए सालभर पहले शहर में 23 जगह एसएलआरएम (सॉलिड लिक्विड रिफार्म मैनेजमेंट) सेंटर खड़े कर दिए।

इसमें करीब 6.25 करोड़ रुपए खर्च किए गए, यानी हर सेंटर करीब 16 लाख रुपए। इनमें से 13 सेंटर घनी बस्तियों में बनाए और जैसे ही यहां कचरा इकट्ठा करना शुरू किया, लोगों के विरोध के कारण इन्हें बंद करना पड़ा। यही नहीं, किसी भी सेंटर में कचरे का सेग्रिगेशन शुरू नहीं किया जा सका। यह कांसेप्ट फेल होने लगा तो पिछले महीने लोकल एजेंसियों ने ये सेंटर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए नियुक्त ठेका कंपनी के हवाले कर दिए। कंपनी ने भी यहां कचरा अलग करने के बजाय नगर निगम को सूचित किया कि यहां कांपेक्टर मशीनें रखी जाएंगी। निगम की सहमति के बाद इस मशीन के लिए सेंटरों की छतें तोड़नी शुरू कर दी गई हैं।

राजधानी को स्वच्छता सर्वेक्षण में अच्छा रैंक दिलाने के लिए लोकल एजेंसियों ने ऐसे प्रयोगों पर पानी की तरह पैसे बहाए, जो सालभर में ही फेल होने लगे हैं। इनमें सबसे बड़ा उदाहरण एसएलआरएम सेंटर हैं, जिनपर बड़ी रकम खर्च की गई। इन सेंटरों का कांसेप्ट यह था कि आसपास के इलाके का पूरा कचरा यहीं लाया जाएगा। इसके बाद इसी सेंटर में गीला और सूखा कचरा अलग किया जाएगा। यहीं से गीले कचरे को खाद बनाने के लिए भेजा जाएगा। सूखा कचरा रीसाइकिलिंग के लिए अलग कर दिया जाएगा। कांसेप्ट अच्छा था, इसलिए नगर निगम ने आनन-फानन में इन सेंटरों के लिए 23 जगह सेलेक्ट कीं और सवा 6 करोड़ रुपए से ज्यादा का फंड भी मंजूर कर दिया। पिछले साल जनवरी-फरवरी में जगह चुनने के बाद दो-ढाई माह में ही सभी जगह बाउंड्रीवॉल से घिरा हुआ करीब 3-3 हजार वर्गफीट का परिसर और रीसाइकिलिंग के लिए दो-तीन बड़े कमरों वाले सेंटर भी तान दिए गए। निगम ने सेंटर बनाने में पैसे तो खर्च कर दिए, लेकिन ज्यादातर जगहों के सेंटर ही बंद हो गए। क्योंकि, निगम अफसर इस कांसेप्ट पर काम ही नहीं शुरू कर पाए। निगम ऐसे लोग भी नहीं बुला पाए जो इन सेंटरों में कचरे को खाद बनाएं या उसका रीसाइकिलिंग में उपयोग करें। इनमें से डूमरतराई और मंडी वगैरह के सेंटर शुरू हुए और कचरे की बदबू फैली तो लोगों ने जमकर विरोध किया। इस वजह से सेंटर बंद करने पड़े। हालांकि आला अफसरों ने इन्हें जगह चुनने के मामले में बड़ी लापरवाही माना, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। बंद किए गए इन सेंटरों में कचरे का पहाड़ इकट्ठा है और कुछ जगह तो चार-पांच महीने से इनके ताले भी नहीं खुले हैं। एक तरह से अफसरों ने करीब 13 सेंटरों को वेस्ट ही मान लिया है।

गीला-सूखा कचरा अलग रखने बनाए एसएलआरएम सेंटरों में 13 विरोध से बंद जो बचे उन्हें दे दिया ठेका कंपनी को, उसने मशीनें रखने शुरू कर दी तोड़फोड़

ऐसे अनुपयोगी हो गए सेंटर

रामनगर, डूमरतराई, कृषि उपज मंडी, दलदल सिवनी सहित सभी 10 जगहों के एसएलआरएम सेंटर निगम ने ठेका कंपनी को हैंडओवर कर दिए हैं। कंपनी यहां अपने हिसाब से तोड़फोड़ कर रही है। शेड हटाए जा रहे हैं, या नए लगा रहे हैं। इन सेंटरों का कायदे से सालभर के भीतर ही कोई काम नहीं बचा क्योंकि कंपनी कचरा उठाकर सरोना ट्रेंचिंग ग्राउंड ले जा रही है। कंपनी को कचरा प्रोसेस करने के लिए 15 महीने में प्लांट लगाना है, लेकिन इसका काम शुरू नहीं हुआ।

रामनगर का सेंटर।

करोड़ों के और प्रयोग भी फेल

साफ-सफाई पर नियमित खर्च के अलावा नगर निगम ने सफाई पर इस साल 10 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर डाले हैं। करीब छह करोड़ रुपए के डस्टबिन बांटे गए। अभी भी शत-प्रतिशत घरों में डस्टबिन बंटे ही नहीं है। व्यापारिक इलाकों में करीब 40 लाख रुपए के स्टैंड वाले डस्टबिन लगाए गए। लगने के कुछ महीनों में ही ये या तो टूट गए या चोरी हो गए। इसके अलावा टायलेट व यूरिनल बॉक्स का कांसेप्ट भी नाकाम रहा। जैसे, तात्यापारा में लगाया टायलेट और यूरिनल बॉक्स का ताला ही नहीं खुला।

कंपनी ही तोड़ रही

एसएलआरएम सेंटर कांपेक्टर मशीनें रखने के लिए ठेका कंपनी रामकी को दे दिया गया है। तोड़फोड़ वहीं की जा रही है, जहां शेड की ऊंचाई कम है। कंपनी ही तोड़फोड़ कर रही है। -हरेन साहू, नोडल अफसर स्वच्छ भारत मिशन

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