पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • राजधानी में सिर्फ 30 फीसदी हाॅर्वेस्टिंग पानी बचाने सिस्टम बनाकर भूला निगम

राजधानी में सिर्फ 30 फीसदी हाॅर्वेस्टिंग पानी बचाने सिस्टम बनाकर भूला निगम

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
जलसंकट से जूझ रही राजधानी में पानी की किल्लत दूर करने के लिए निगम आैर जिला प्रशासन ने शहर के लगभग 50 हजार स्थानों पर वाटर हाॅर्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की प्लानिंग की थी। लेकिन लगातार प्रयासों के बाद भी निगम साल भर में सिर्फ 4 हजार सिस्टम ही लगा पाया। ये सिस्टम सरकारी दफ्तरों, निजी आवासों, दुकानों आैर अन्य स्थानों पर लगाए गए हैं। इसके बाद पिछले पांच महीने से अभियान ठंडा पड़ गया। राजधानी में लगभग ढाई लाख प्रापर्टी है, जिनसे निगम संपत्तिकर वसूलता है। हालत यह है कि इनमें से सिर्फ 30 फीसदी संपत्तियों में ही वाटर हॉर्वेस्टिंग सिस्टम लगाए गए हैं।

राजधानी समेत पूरे प्रदेश में वाटर लेवल काफी नीचे चला गया है। प्रदेश में लगातार बढ़ रहे जलसंकट के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए राज्य सरकार ने साल 2010 में 500 वर्गफीट से ज्यादा के निर्माण में वाटर हॉर्वेस्टिंग लगाना अनिवार्य किया था, लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा है। दो साल पहले पानी को लेकर मचे बवाल के बाद रायपुर कलेक्टर ने सभी सरकारी कार्यालयों में वाटर हॉर्वेस्टिंग लगाने के निर्देश दिए थे। इसके अलावा नगर निगम ने भी राजधानी यह सिस्टम लगाने के लिए कहा था।

25 हजार रुपए तक ली गई फीस

निगम ने शासन की गाइड लाइन के मुताबिक सिस्टम लगाने के लिए 5 से 25 हजार रुपए तक फीस लेना शुरू किया था। साथ ही तीन साल के भीतर सिस्टम लगाना जरूरी किया गया था। सिस्टम लगाने के बाद निगम की टीम सर्वे कर लोगों द्वारा जमा की गई फीस वापस करना था। लेकिन कितने लोगों ने सिस्टम के पैसे वापस लिए, इसका भी रिकार्ड उनके पास नहीं है।

जलसंकट से जूझ रहा शहर, फिर भी इस व्यवस्था पर नहीं दे रहे ध्यान

वाटर हाॅर्वेस्टिंग सिस्टम

गार्डन नल

नए के अलावा पुराने मकानों में भी लगाना जरूरी

नगर निगम के अफसरों के मुताबिक राजधानी में लगभग ढाई लाख मकान हैं, जिनसे निगम संपत्तिकर वसूलता है। यानी इनमें से लगभग 70 फीसदी संपत्तियों में नियमत: वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगाया जाना था। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है। सरकार ने भले ही 2010 में यह नियम लागू किया है, लेकिन उसके पूर्व में बने सभी सरकारी और निजी भवनों में भी वाटर हाॅर्वेस्टिंग सिस्टम लगाना जरूरी किया गया था जबकि पुरानी छोटी प्रापर्टी को इससे छूट दी गई थी। जानकारी के मुताबिक सरकारी नियम में 3228 वर्गफीट से अधिक क्षेत्रफल वाली सभी पुरानी प्राॅपर्टी में यह सिस्टम लगाना अनिवार्य है। सिस्टम नहीं लगाने पर प्रति 100 वर्गमीटर पर 1000 रुपए प्रतिवर्ष की दर से जुर्माना भी लगाने का प्रावधान किया गया है।

सरकारी दफ्तरों में लगाना जरूरी

रायपुर कलेक्टर आेपी चौधरी ने भी लगभग साल भर पहले ही जलसंकट को देखते हुए सभी सरकारी दफ्तरों में वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य किया था। आदेश के तहत तीन माह के भीतर सारे सरकारी संस्थानों में वॉटर हार्वेस्टिंग लगाना जरूरी था। जिला प्रशासन के अफसरों का कहना है कि सिर्फ 30 फीसदी दफ्तरों में ही ऐसा किया जा सका है।

हवा द्वार

अंडरग्राउंड वाटर स्टोरेज टैंक

उच्चस्तरीय वाटर स्टोरेज टैंक

छत से आने वाली बारिश के पानी का कलेक्शन

निगम के पास रिकार्ड नहीं कितने घरों में लगा सिस्टम

इस संबंध में जब भास्कर ने निगम के अफसरों से बात की तो किसी को भी यह पता नहीं है कि राजधानी के कितने घरों में वाटर हाॅर्वेस्टिंग सिस्टम लगा हुआ है। लेकिन नए बनाए जाने वाले मकानों, भवनों में निगम ने इसे अनिवार्य भी किया है। अफसरों का कहना है कि इसके बिना किसी भी नया भवन निर्माण करने की अनुमति ही नहीं दी जा रही है। पुराने मकानों में इस सिस्टम को लगाने की बाध्यता रखी गई थी। इसके लिए कुछ दिन तक जोन स्तर पर मॉनिटरिंग भी की गई थी।

निगम में एक भी हाइड्रोलाॅजिस्ट नहीं

नगर निगम के पास एक भी हाइड्रोलाॅजिस्ट नहीं है। वैसे नगर निगम ने वाटर हॉर्वेस्टिंग सिस्टम लगाने के लिए 15 हाइड्रोलाॅजिस्ट को अधिकृत किया गया है। जागरुक लोग इनकी मदद से सिस्टम लगवा भी रहे हैं। लाइसेंस लिए हुए हाइड्रोलॉजिस्ट का कहना है कि निगम ने पिछले पांच- छह महीने से वाटर हॉर्वेस्टिंग सिस्टम लगाने पर ध्यान देना बंद कर दिया है, इसलिए उनके पास लोग आ ही नहीं रहे हैं। उनका कहना है कि वाटर लेवल लगातार नीचे जा रहा है।

सभी जोन को दिए निर्देश

इस बार भी हार्वेस्टिंग के लिए योजना बनाई गई है। एक बैठक हो चुकी है जिसमें सभी जोनों को कड़ाई करने को कहा गया है। पिछले साल सरकारी आैर निजी भवन मिलाकर लगभग 4 हजार 110 भवनों में हाॅर्वेस्टिंग की थी। वाटर हाॅर्वेस्टिंग के बिना नए भवनों के निर्माण की स्वीकृति ही नहीं दी जा रही है। प्रमोद दुबे, महापौर नगर निगम रायपुर

खबरें और भी हैं...