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छत्तीसगढ़ में एससी-एसटी वर्ग के लाेगों की शिकायत पर बिना जांच दर्ज नहीं होगा केस
सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू
भास्कर न्यूज | रायपुर
एससी-एसटी एस्ट्रोसिटी पर सुप्रीम कोर्ट के ताजे फैसले को छत्तीसगढ़ में लागू कर दिया गया है। एडीजी अपराध अनुसंधान एके विज ने राज्य के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों से कहा है कि वे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का कड़ाई से पालन करें वरना उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तो होगी ही, साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना के दोषी भी होंगे। विज ने 6 अप्रैल को यह पत्र जारी किया था। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने 20 मार्च को एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम-1989 के प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने के निर्देश दिए थे।
ये हैं निर्देश: अत्याचार निवारण अधिनियम के मामलों में अग्रिम जमानत स्वीकार करने में कोई रोक नहीं है। अगर प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है या जहां न्यायिक स्क्रूटनी पर शिकायत प्रथम दृष्टया झूठी पाई जाती है। एेसे मामले में केवल नियुक्तिकर्ता शेष|पेज 10
प्राधिकारी की लिखित अनुमति से और गैर सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की अनुमति के बाद हो सकती है। स्वीकृति देने के कारणों का उल्लेख प्रत्येक मामले में किया जाना आवश्यक है। मजिस्ट्रेट के उक्त कारणों की स्क्रूटनी किए जाने के बाद ही आगामी अभिरक्षा का आदेश देगा। एक निर्दोष को झूठा फंसाने से बचाने के लिए प्रारंभिक जांच हो सकती है। जांच में ये पता लगाया जाएगा कि आरोपों में अत्याचार निवारण अधिनियम का अपराध बनता है या नहीं और वह आरोप तुच्छ या उत्प्रेरित तो नहीं है।
उधर, फैसले के खिलाफ अध्यादेश ला सकता है केंद्र
नई दिल्ली | एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असर खत्म करने के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लाने पर विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने गत 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने सहित कई दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके खिलाफ दलित संगठनों का गुस्सा शांत करने के लिए केंद्र सरकार एससी-एसटी एक्ट को पुराने रूप में बहाल करना चाहती है। शेष|पेज 10
अध्यादेश के अलावा मानसून सत्र में संशोधन विधेयक पेश करने पर भी विचार किया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार सरकार जुलाई में शुरू होने वाले मानसून सत्र में एससी-एसटी एक्ट, 1989 में संशोधन का बिल ला सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का आदेश उलटने का यह दूसरा विकल्प होगा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “अध्यादेश लागू करने से एससी-एसटी समुदायों का गुस्सा तुरंत शांत किया जा सकता है। उस स्थिति में भी संसद में विधेयक तो पेश करना ही पड़ेगा।’
सूत्रों के अनुसार अभी यह फैसला नहीं हुआ है कि कानून का पुराना स्वरूप बहाल करने के लिए क्या कदम उठाया जाएगा। सरकार का कदम फैसले के खिलाफ दायर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिका है।