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पीलिया से सात मौतें पाइप बदलना जरूरी राजधानी में सारे दफ्तर फाइल मूवमंेंट भी यहीं

3 वर्ष पहले
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पीलिया से राजधानी में 26 मार्च को कांपा की महिला की मृत्यु हुई, उसके बाद एक माह के भीतर एक-एक करके सात लोगों की जान गई और 200 से ज्यादा बीमार पड़ गए। पहली मौत के 10 दिन के भीतर निगम के सर्वे में ही खुलासा हो गया कि नालियों में डूबी 50 किमी पाइपलाइनें सड़क चुकी हैं। इन्हीं से पीलिया घरों तक पहुंच रहा है, इसलिए इन्हें तुरंत बदलना होगा। दो दिन के भीतर नगर निगम ने 21 करोड़ रुपए का प्रस्ताव बनाकर शासन को भेज दिया। पीलिया यहीं फैला है, निगम से लेकर शासन तक के सारे मुख्यालय इसी शहर में हैं, इसके बावजूद दो महीने बीत गए लेकिन इस मद से एक भी पाइप लाइन बदलनी नहीं गई है। इसी शहर में मंजूरी के लिए भटकती फाइल दो हफ्ते पहले मंजूर हो गई लेकिन फंड ट्रांसफर नहीं हुआ है। पाइप बदलने के लिए टेंडर जारी होंगे, फिर काम शुरू होगा। इसमें एक माह और लगने की आशंका है और पीलिया की दहशत थमने के बजाय बढ़ती जा रही है।

सात मौतें और दो सौ से ज्यादा लोगों को अपनी चपेट में ले चुका पीलिया राजधानी में अब भी महामारी की तरह फैला है। मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। मोवा से यह बीमारी शहर के चंगोराभाठा, गुढ़ियारी, पंचशील नगर, कोटा सहित कई इलाकों तक फैल गई है लगातार बढ़ती ही जा रही थी। सर्वे से पता चला कि पीलिया कि वर्षों पुरानी पाइपलाइनें जो नालियों में डूबी हुई हैं। वहीं से नाली का गंदा पानी घरों तक पहुंच रहा है। इससे लोग पीलिया की चपेट में आ रहे हैं और सात जानें चली गई हैं। फिर भी, 50 किमी पाइपलाइनें बदलने के लिए एक ही शहर में फाइलों का मूवमेंट थम नहीं रहा है।



कुछ दिन पहले तक फंड मंजूर करने के लिए फाइलें दौड़ती रहीं, अब टेंडर की प्रक्रिया पूरी करने में हफ्तों लगने वाले हैं।



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सब होना है इसी शहर में कुछ नहीं हुआ दो माह में

गुस्से में शहर, खतरे में जानें फिर भी नहीं करते आउट ऑफ वे...

सरकारी प्रक्रियाएं घातक हो चली हैं। बहुत सारे मुद्दों पर आउट ऑफ वे... जाकर काम होता है। जीवन खतरे में है, फिर भी मामला उलझा है। अरुण कुमार, रायपुरा

हाईकोर्ट ने कहा - बस्ती के 35 हजार लोगों को शिफ्ट करो। कारण बताना चाहिए कि सरकारी एजेंसियां दो माह से फाइलें क्यों दौड़ा रही हैं। विजय कुमार, लाखे नगर

मनोरंजन और स्मार्ट बनाने के लिए एजेंसियों के पास करोड़ों रुपए हैं। लोगों की जान बचाने के लिए थोड़े फंड में आखिर रुकावट क्या है? शशि चंद्राकर, डीडी नगर

ज्वलंत समस्या नहीं माना

नगर निगम को शहरी सरकार माना जाता है। शहरी क्षेत्र में पीलिया, महामारी या ऐसी ही कोई गंभीर मुद्दा उत्पन्न होने पर नगर निगम की विशेष सामान्य सभा बुलाकर समस्या को जल्द सुलझाने पर निर्णय लिया जाता है। महापौर खुद या एक चौथाई पार्षद मिलकर विशेष सभा बुला सकते हैं। अगर सभापति सभा न बुलाए तो 15 दिन में निगम कमिश्नर सभा बुलाने का अधिकार रखते हैं।

राजनीति और सरकारी प्रक्रिया से नहीं उबर पाए

यह बड़ी विडंबना है कि अपना ही पैसा शासन से मांगना पड़ता है। राजनीति से ऊपर उठकर ऐसे कार्यों पर तो उदारता दिखानी ही चाहिए। प्रमोद दुबे, महापौर रायपुर

पीलिया एक ज्वलंत और आकस्मिक विषय था, जिसपर विशेष सामान्य सभा बुलाई जानी थी। मेरे पास ऐसा कोई प्रस्ताव ही नहीं आया। प्रफुल्ल विश्वकर्मा, निगम सभापति

पाइपलाइन का टेंडर जारी कर रहे हैं। मंजूरी मिलते ही काम शुरू कर देंगे। जोन स्तर पर थोड़ा बहुत काम तो पहले ही शुरू कर चुके हैं। रजत बंसल, निगम कमिश्नर

पाइपलाइनें बदलने के लिए 21 करोड़ चाहिए। शासन से ही मंजूरी में विलंब हुआ है। फंड मंजूर हो गया तो टेंडर में कुछ वक्त लगेगा। नागभूषण राव यादव, चेयरमैन जल

देवेंद्रनगर के इस गड्ढे को इंतजार है नई पाइपलाइन का।

बदल सकते थे लोन लेकर

50 किमी की पाइपलाइन बदलने निगम महीनेभर शासन की मंजूरी का इंतजार किया। 21 करोड़ की व्यवस्था निगम खुद ही करके पाइपलाइन बदलने का काम कर सकता है। तात्यापारा चौड़ीकरण के लिए निगम ने लोन लेकर मुआवजा बांटा। अपनी गुडविल का उपयोग कर निगम खुद अपने सोर्स से पैसे की व्यवस्था कर सकता था। शासन की मंजूरी में वक्त नहीं लगता।

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