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अस्सी किलो वजनी पहिया नौ लोगों ने एक-एक अंगुली से उठाया, हुई अच्छी बारिश की भविष्यवाणी

3 वर्ष पहले
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पहिया उठाने केे पहले पूजा की। फिर एक-एक अंगुली लगाकर 9 लोगों ने पहिया उठाया जो कंधे से ऊपर तक उठा।

एक शताब्दी से चली आ रही परंपरा

लगभग 80 किलो वजनी पहिए को 9 व्यक्तियों ने मिलकर केवल एक-एक अंगुली से उठाया इसे माताजी की ही कृपा माना जाता है। 9 व्यक्तियों में हीराजी कोटवाल, कौदा लछेटा, माना मोलवा, बाबू भायल, कोदा सेप्टा, बाबुलाल पटेल, गोमालाल सोलंकी, नरसिंग मुलेवा सेठ एवं श्यामा मुलेवा सम्मिलित थे। बाबुजी जमादारी (71) ने बताया कि यह परंपरा गत करीब एक शताब्दी से अधिक से चली आ रही है और इसका निर्वहन समाजजन बखूबी कर रहे हैं। ग्राम के रमेश सतपुड़ा ने बताया कि पहिया भी बहुत पुराना होकर इसकी पूजा पाठ करके शुभ मुहूर्त में इसे उठाया जाता हैं।

चारों बार पहिया कंधे से अधिक ऊंचाई तक उठा

पहली बार पहिया माताजी के आव्हान एवं उनकी सभी पर कृपा बनी रहें इसके लिए उठाया गया यह सिर के उपर अधिक ऊंचाई तक उठा। इससे यह आशय लगाया गया कि माताजी की सभी पर कृपा बनी रहेगी। दूसरी बार पहिया मानसून की बारिश कैसी होगी के लिए उठाया। इसमें भी यह कंधे से अधिक ऊंचाई तक उठा। इसका यह मतलब रहा कि बारिश बहुत अच्छी होगी। नदी नाले, कुएं, तालाब सब लबालब होकर खेतों में भरपूर पानी मिलेगा। जिससे खरीफ की फसल बहुत अच्छी पकेगी। तीसरी बार पहिया रबी की फसल के लिए उठाया गया इसमें भी यह कंधे की ऊंचाई तक उठा। इससे यह प्रतीत हुआ कि रबी की फसल भी बहुत अच्छी होगी। इससे गांवों में संपन्नता बढ़ेगी। किसान खुशहाल रहेगा।चौथी बार पहिया गांव की सामाजिक एकता के लिए उठाया गया। इसे पंच के लिए पहिया उठाना कहा जाता है। इसमें भी यह सिर की ऊंचाई तक उठा, जिससे आशय लगाया गया कि गांव में सभी में सामाजिक एकता, सामाजिक कार्य एवं सभी में मेल जोल की भावना रहकर ग्राम विकास की और अग्रसर होगा। माताजी की आरती के बाद श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई। यह प्रसादी भी समाज के ग्राम में 125 घरों से बनाकर लाई जाती हैं जिसका वितरण सभी को किया जाता है। इसी प्रकार से ग्राम अमोदिया एवं दलपुरा में अक्षय तृतीया पर ही पहिया उठाया गया। दोनों स्थानों पर भी अच्छी ऊंचाई तक उठा।

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