जिले में स्व सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार का सहारा बन रहीं हैं। घर के राशन के लिए पैसे नहीं होने पर जो महिलाएं दूसरे के सामने हाथ फैलाती थीं, वे आज आर्थिक रूप आत्मनिर्भर बनकर स्वावलंबी बनने के गुर सिखा रहीं हैं। यह सब हो पाया है जिमीकंद रोपण महाअभियान से।
समूह से जुड़कर महिलाएं अपने स्तर पर जिमीकंद की खेती कर हजारों नहीं लाखों रुपए कमा रहीं हैं। दो सालों के भीतर 1 हजार 99 समूह की महिलाएं 12 लाख 2011 जिमीकंद का रोपण कर 2 करोड़ रुपए का व्यवसाय कर चुकी हैं। इस वर्ष जिलेभर के 500 गांवों में महिलाओं ने 23 लाख 35 हजार जिमीकंद रोपण का लक्ष्य रखा है। इसके पीछे महिलाएं 4 करोड़ से ज्यादा की कमाई करेंगी। इन महिलाओं की मेहनत के बल पर आने वाले कुछ सालों में हमारा जिला जिमीकंद के उत्पादन में नंबर वन भी बन जाएगा।
1500 समूहों से की शुरुआत: वर्ष 2014-15 में प्रयोग बतौर 1500 महिला समूह को अपने-अपने स्तर पर जिमीकंद का उत्पादन करने प्रेरित किया। महिलाओं ने सामूहिक रूप से 12 लाख 2011 जिमीकंद का रोपण किया। इससे दो करोड़ रुपए की आमदनी हुई। अब स्व सहायता समूह ने दूसरों को भी आत्मनिर्भर बनाने अभियान शुरू कर दिया।
महिलाओं का जज्बा
स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद मिला लाभ, 2014 में की थी शुरुआत, अब मुनाफे की ओर बढ़ रही महिलाएं
राजनांदगांव.बाड़ी में उगाया जिमीकंद।
ये महिलाएं दूसरों के लिए बनीं प्रेरणास्रोत
आत्मनिर्भर बनकर स्वावलंबी बनने के गुर सिखा रहीं
छुईखदान विकासखंड के केसला गांव की महिलाओं ने समूह से प्रेरणा लेकर जिमीकंद की खेती की और आज हजारों रुपए का आर्थिक लाभ लेते हुए दूसरों को भी इस खेती के लिए प्रेरित कर रही हैं। हुलिया बाई वर्मा ने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने से उसे मजदूरी करनी पड़ती थी। समूह से प्रेरणा लेकर बीते साल घर की बाड़ी में 1 क्विं. जिमीकंद की खेती की।
फूलबासन से मिली प्रेरणा
मां बम्लेश्वरी महिला स्व सहायता समूह की ओर से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लंबे समय से मुहिम छेड़ी गई है। पद्मश्री फुलबासन यादव ने देखा कि ग्रामीण महिलाओं को घर की आर्थिक स्थिति के सुधार के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। विचार आया कि घर की बाड़ी या फिर खाली पड़ी जमीन पर जिमीकंद की खेती शुरु की जाए।
छह माह में करें उत्पादन
घर की बाड़ी में आधा फीट का गड्ढा खोदकर जिमीकंद के बीज को डाला जाता है। जहां पर पानी की उपलब्ध होती है, वहां इसका उत्पादन जल्द होता है यानी की छह माह के भीतर ही उत्पादन कर आर्थिक लाभ लिया जा सकता है। महिलाओं को इस खेती के लिए प्रेरित करने वाली पद्मश्री फुलबासन बाई यादव ने बताया कि बारिश के पहले ही इसका रोपण करें।