व्रत का मतलब अन्न त्याग नहीं, बुराइयों को छोड़ना शुरू करें
राजसमंद| छोगाला छैल नंदवाना महिला सत्संग समिति राजनगर नंदवानावास में श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ के तीसरे दिन मंगलवार को मथुरा से आए आचार्य पं. संजय कृष्ण उपाध्याय ने कहा कि व्रत का तात्पर्य सिर्फ फलाहार लेना या अन्न का त्याग करना ही नहीं होता बल्कि व्रत का सही मायने में अर्थ संकल्प या प्रतिज्ञा व्यक्त करना होता हैं। इस बात का व्रत लेना कि हम बुराई का परित्याग कर अच्छाई ग्रहण करेंगे। प्रियव्रत और उत्थानपात प्रसंग के दौरान उन्होंने संस्कार विषय पर विस्तार से चर्चा की और कहा कि बालक तो कच्चे घड़े के समान होता है, उसे हम जैसा चाहें वैसा रूप दे सकते है। हम बाल मन को जैसे संस्कार देंगे, वह जीवन में वैसा ही व्यवहार करेगा। हम जैसा बीज बोएंगे या जैसा पेड़ लगाएंगे, हमें वैसा ही फल प्राप्त होगा अर्थात जैसी हमारी दृष्टि होगी वैसी ही सृष्टि होगी। वह अपनी संतान को सुसंस्कार दें ताकि वह अपने परिवार के साथ-साथ समाज व राष्ट्र सेवा में समर्पित हो सके। परम भक्त ध्रुव के जीवन चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि हरिनाम स्मरण व सत्संग का ही प्रतिफल था कि बालक ध्रुव प्रभु की अपार कृपा के पात्र बने। इसी कड़ी में माता सती एवं भगवान शिव, राजा दक्ष प्रजापति एवं माता सती तथा माता सती के व्रत पालन से जुड़े प्रसंगों का विस्तृत विवेचन किया। इसी क्रम में आचार्य ने जब राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम पर आधारित भक्ति भजन अंखिया लड़ गई मोरे श्याम से ओ मेरी सखियां... गया। इसके बाद आचार्य ने कथा के अन्य कई प्रसंगों का भी वर्णन करते हुए लोगों को हरिनाम सुमिरण कराया। अंत में आरती हुई और भगवान को भोग धराकर प्रसाद वितरण किया। इसके बाद आचार्य ने मेरे सांवरिया का नाम श्रीकृष्णा, मेरे प्यारे कान्हा का नाम श्रीकृष्णा... हरि कीर्तन के साथ कथा की शुरूआत की।
राजसमंद। भागवत कथा में नृत्रू करतीं महिलाएं।