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रामदेवरा : देश का पहला ऐसा मंदिर जहां मन्नत पूरी होने पर चढ़ाए जाते हैं घोड़े

3 वर्ष पहले
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जी हां देश में एक ऐसा मंदिर भी है जहां मन्नत पूरी होने पर घोड़े चढ़ाए जाते हैं। इन घोड़ों की देखभाल के लिए मंदिर ट्रस्ट की ओर से अस्तबल भी बनाया गया है। श्रद्धालुओं द्वारा घोड़े चढ़ाए जाने के बाद यहां उन्हें रखा जाता है। हालांकि घोड़े चढ़ाने की परंपरा अभी हाल में शुरू हुई है। वैसे सदियों से यहां प्रतीक के रूप में कपड़े के घोड़े चढ़ाए जाते हैं। यह परंपरा अभी भी कायम है। इस मंदिर में पिछले दो साल में राजस्थान, गुजरात और पंजाब से यहां दर्शन करने आए कुछ श्रद्धालुओं ने घोड़े चढ़ाए। इनमें मारवाड़ी एवं काठियावाड़ी नस्ल के करीब छह घोड़े हैं। भारत पाक के सीमावर्ती जिले में स्थित बाबा रामदेव की समाधि पर दो साल पहले घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। पिछले दो वर्षों में राजस्थान, पंजाब और गुजरात से आए श्रद्धालुओं द्वारा यहां जीवित घोड़े चढाएं गए हैं। घोड़े चढ़ाने की परम्परा के शुरू होने के बाद बाबा रामदेव समाधि समिति द्वारा इन घोड़ों की अलग व्यवस्था रूणीचा कुआं पर की गई है। यहां इनकी देखभाल की जा रही है। यहां बनी घुड़साल में इन दिनों आधा दर्जन घोड़ों को रखा गया है। यहां इनके सूखे व हरे चारे, दाने तथा पानी की व्यवस्था की गई है। वहीं इनकी उचित निगरानी और देखभाल के लिए घोड़ों के जानकार को नियुक्त किया गया है।राजस्थान के साथ साथ गुजरात तथा अन्य राज्यों में द्वारकाधीश के अवतार बाबा रामदेव परचों तथा मन्नत पूर्ण करने के दौरान पूजे जाते हैं। बाबा की ध्वजा जहां उनकी आस्था का प्रतीक माना जाता है वहीं कपड़े से बना घोड़ा मान्यता के अनुसार बाब रामदेव की परचों के साथ साथ उनकी पसंद भी माना जाता है। लेकिन इन दिनों कपड़े के घोड़ों के साथ साथ बाबा रामदेव की समाधि पर श्रद्धालुओं द्वारा जीवित घोड़े भी चढाएं जा रहे हैं। जहां भी बाबा रामदेवजी का नाम आता है, वहां उनके प्रिय लीले घोड़े का नाम जरूर आता है। बहुत ही कम प्रतिमाएं या तस्वीरें ऐसी जिनमें बाबा रामदेव को बिना घोड़े के दिखाया गया। आज से साढ़े छह सौ पूर्व राजपरिवार में अवतार लेकर ऊंच-नीच, जात-पात का भेदभाव मिटा पिछड़े वर्ग को गले लगा सामाजिक समरसता का संदेश देने वाले बाबा रामदेव के मंदिर में घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई है। बाबा रामदेव की समाधि पर अपनी मन्नत पूर्ण होने पर श्रद्धालु घोड़े चढ़ा रहे हैं।

नेपालसिंह तंवर | रामदेवरा

जी हां देश में एक ऐसा मंदिर भी है जहां मन्नत पूरी होने पर घोड़े चढ़ाए जाते हैं। इन घोड़ों की देखभाल के लिए मंदिर ट्रस्ट की ओर से अस्तबल भी बनाया गया है। श्रद्धालुओं द्वारा घोड़े चढ़ाए जाने के बाद यहां उन्हें रखा जाता है। हालांकि घोड़े चढ़ाने की परंपरा अभी हाल में शुरू हुई है। वैसे सदियों से यहां प्रतीक के रूप में कपड़े के घोड़े चढ़ाए जाते हैं। यह परंपरा अभी भी कायम है। इस मंदिर में पिछले दो साल में राजस्थान, गुजरात और पंजाब से यहां दर्शन करने आए कुछ श्रद्धालुओं ने घोड़े चढ़ाए। इनमें मारवाड़ी एवं काठियावाड़ी नस्ल के करीब छह घोड़े हैं। भारत पाक के सीमावर्ती जिले में स्थित बाबा रामदेव की समाधि पर दो साल पहले घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। पिछले दो वर्षों में राजस्थान, पंजाब और गुजरात से आए श्रद्धालुओं द्वारा यहां जीवित घोड़े चढाएं गए हैं। घोड़े चढ़ाने की परम्परा के शुरू होने के बाद बाबा रामदेव समाधि समिति द्वारा इन घोड़ों की अलग व्यवस्था रूणीचा कुआं पर की गई है। यहां इनकी देखभाल की जा रही है। यहां बनी घुड़साल में इन दिनों आधा दर्जन घोड़ों को रखा गया है। यहां इनके सूखे व हरे चारे, दाने तथा पानी की व्यवस्था की गई है। वहीं इनकी उचित निगरानी और देखभाल के लिए घोड़ों के जानकार को नियुक्त किया गया है।राजस्थान के साथ साथ गुजरात तथा अन्य राज्यों में द्वारकाधीश के अवतार बाबा रामदेव परचों तथा मन्नत पूर्ण करने के दौरान पूजे जाते हैं। बाबा की ध्वजा जहां उनकी आस्था का प्रतीक माना जाता है वहीं कपड़े से बना घोड़ा मान्यता के अनुसार बाब रामदेव की परचों के साथ साथ उनकी पसंद भी माना जाता है। लेकिन इन दिनों कपड़े के घोड़ों के साथ साथ बाबा रामदेव की समाधि पर श्रद्धालुओं द्वारा जीवित घोड़े भी चढाएं जा रहे हैं। जहां भी बाबा रामदेवजी का नाम आता है, वहां उनके प्रिय लीले घोड़े का नाम जरूर आता है। बहुत ही कम प्रतिमाएं या तस्वीरें ऐसी जिनमें बाबा रामदेव को बिना घोड़े के दिखाया गया। आज से साढ़े छह सौ पूर्व राजपरिवार में अवतार लेकर ऊंच-नीच, जात-पात का भेदभाव मिटा पिछड़े वर्ग को गले लगा सामाजिक समरसता का संदेश देने वाले बाबा रामदेव के मंदिर में घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई है। बाबा रामदेव की समाधि पर अपनी मन्नत पूर्ण होने पर श्रद्धालु घोड़े चढ़ा रहे हैं।

मान्यता है कि बाबा रामदेव ने बचपन में कपड़े के घोड़े को आसमान में उड़ा कर दिया था अवतारी पुरुष होने का परचा

नेपालसिंह तंवर | रामदेवरा

जी हां देश में एक ऐसा मंदिर भी है जहां मन्नत पूरी होने पर घोड़े चढ़ाए जाते हैं। इन घोड़ों की देखभाल के लिए मंदिर ट्रस्ट की ओर से अस्तबल भी बनाया गया है। श्रद्धालुओं द्वारा घोड़े चढ़ाए जाने के बाद यहां उन्हें रखा जाता है। हालांकि घोड़े चढ़ाने की परंपरा अभी हाल में शुरू हुई है। वैसे सदियों से यहां प्रतीक के रूप में कपड़े के घोड़े चढ़ाए जाते हैं। यह परंपरा अभी भी कायम है। इस मंदिर में पिछले दो साल में राजस्थान, गुजरात और पंजाब से यहां दर्शन करने आए कुछ श्रद्धालुओं ने घोड़े चढ़ाए। इनमें मारवाड़ी एवं काठियावाड़ी नस्ल के करीब छह घोड़े हैं। भारत पाक के सीमावर्ती जिले में स्थित बाबा रामदेव की समाधि पर दो साल पहले घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। पिछले दो वर्षों में राजस्थान, पंजाब और गुजरात से आए श्रद्धालुओं द्वारा यहां जीवित घोड़े चढाएं गए हैं। घोड़े चढ़ाने की परम्परा के शुरू होने के बाद बाबा रामदेव समाधि समिति द्वारा इन घोड़ों की अलग व्यवस्था रूणीचा कुआं पर की गई है। यहां इनकी देखभाल की जा रही है। यहां बनी घुड़साल में इन दिनों आधा दर्जन घोड़ों को रखा गया है। यहां इनके सूखे व हरे चारे, दाने तथा पानी की व्यवस्था की गई है। वहीं इनकी उचित निगरानी और देखभाल के लिए घोड़ों के जानकार को नियुक्त किया गया है।राजस्थान के साथ साथ गुजरात तथा अन्य राज्यों में द्वारकाधीश के अवतार बाबा रामदेव परचों तथा मन्नत पूर्ण करने के दौरान पूजे जाते हैं। बाबा की ध्वजा जहां उनकी आस्था का प्रतीक माना जाता है वहीं कपड़े से बना घोड़ा मान्यता के अनुसार बाब रामदेव की परचों के साथ साथ उनकी पसंद भी माना जाता है। लेकिन इन दिनों कपड़े के घोड़ों के साथ साथ बाबा रामदेव की समाधि पर श्रद्धालुओं द्वारा जीवित घोड़े भी चढाएं जा रहे हैं। जहां भी बाबा रामदेवजी का नाम आता है, वहां उनके प्रिय लीले घोड़े का नाम जरूर आता है। बहुत ही कम प्रतिमाएं या तस्वीरें ऐसी जिनमें बाबा रामदेव को बिना घोड़े के दिखाया गया। आज से साढ़े छह सौ पूर्व राजपरिवार में अवतार लेकर ऊंच-नीच, जात-पात का भेदभाव मिटा पिछड़े वर्ग को गले लगा सामाजिक समरसता का संदेश देने वाले बाबा रामदेव के मंदिर में घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई है। बाबा रामदेव की समाधि पर अपनी मन्नत पूर्ण होने पर श्रद्धालु घोड़े चढ़ा रहे हैं।

रूणीचा कुआं पर बने अस्तबल में रखा जा रहा है इन घोड़ों को

रूणीचा कुआं पर बने अस्तबल में रखा जा रहा है इन घोड़ों को

काठियावाड़ी व मारवाड़ी नस्ल के घोड़े चढ़ाए

बाबा रामदेव की सवारी के रूप में कपड़े का घोड़ा तो श्रद्धालु सदियों से चढ़ाते आ रहे हैं। मगर वर्तमान में श्रद्धालुओं में जीवित घोड़ा चढ़ाने की मान्यता बलवती हो रही है। इसी के चलते मारवाड़ी एवं काठियावाड़ी नस्ल के घोड़े बाबा की घुड़साल में आधा दर्जन से अधिक घोड़े शोभा बढ़ा रहे हैं। बाबा रामदेव समाधि समिति द्वारा घोड़ों के लिए रूणीचा कुआं पर अलग व्यवस्था की गई है और यहां इनके चारे, पानी और छाया की बेहतर व्यवस्था की गई है। कर्मचारियों द्वारा घोड़ों की अच्छी देखभाल की जा रही है। साथ ही इन्हें स्वस्थ रखने के लिए नारियल का चूरा व घी को खुराक में शामिल किया जा रहा है।

कपड़े का घोड़ा बनाना सबसे बड़ा उद्योग

बाबा रामदेव सवारी के रूप में घोड़े का उपयोग करते थे। उनके घोड़े का नाम लीला घोड़ा था। बाबा रामदेवजी द्वारा समाधि लेने के बाद उनके साथ घोड़ा भी लोकप्रिय हो गया। इसी के चलते रामदेवरा एवं पोकरण के दर्जी समाज के लोग कपड़े का घोड़ा बनाने का व्यवसाय करते हैं रामदेवरा आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु बाबा की समाधि पर प्रसाद व पूजा सामग्री के साथ कपड़े का घोड़ा चढाएं बिना अपनी यात्रा को अधूरी समझता है। इसी मान्याता के कारण घोड़े चढ़ाए जाते हैं।

यह है मान्यता

बाबा रामदेव ने बाल्यकाल में अपनी माता मेणादे से घोड़े की सवारी की मांग की। तब माता ने बालक रामदेव को दर्जी से कपड़े का घोड़ा बना कर मंगवाया। ऐसी लोक मान्यता है कि उसी घोड़े की सवारी करके उस घोड़े को आकाश तक उड़ा कर सभी को अचंभित करते हुए अपने अवतारी पुरुष होने का संकेत दिया था।

बाबा रामदेव की समाधि पर इन दिनों कपड़े के विशाल घोड़ों के साथ साथ श्रद्धालुओं द्वारा जीवित घोड़ें भी चढाएं जा रहे हैं। वहीं समाधि समिति द्वारा इन जीवित घोड़ों की सुरक्षा व रखरखाव किया जा रहा है। गादीपति राव भोमसिंह तंवर, अध्यक्ष, समाधि समिति रामदेवरा

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