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भागवत श्रवण से प्रेत योनि से भी मुक्ति : स्वामी माधवानंद

3 वर्ष पहले
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श्रीमद््भागवत कथा का श्रवण मनुष्यों को आत्मिक और मानसिक सुकून तो देता ही है, इसके श्रवण से प्रेत योनि से भी मुक्ति की प्राप्ति होती है। चिन्मय मिशन रांची के आचार्य स्वामी माधवानंद ने इस उद्गार के साथ शुक्रवार को चौथे दिन जवाहर विद्या मंदिर श्यामली के सभागार में श्रीमद््भागवत कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाया। उन्होंने इससे संबंधित एक कथा सुनाई।

तुंगभद्रा नदी के किनारे एक अनुपम नगर था, जहां के सभी वाशिंदे अच्छे आचरण और सत्कर्मी थे। ब्राह्मण आत्मदेव की प|ी धुंधली नि:संतान थीं। इस दु:ख में धुंधली आत्महत्या के उद्देश्य से एक तालाब के पास गई। उसकी आत्महत्या की मंशा को जानकर वहां एक संन्यासी ने उन्हें रोका। कहा- आपके भाग्य में संतान सुख नहीं है, इसलिए संतान नहीं हो रही है। संन्यासी ने संतान प्राप्ति के लिए ब्राह्मण को उनकी प|ी के लिए एक फल दिया, परंतु प|ी ने उस फल का सेवन न कर गाय के नाद में डाल दिया। धुंधली को पुत्र नहीं हुआ, तो उसने अपनी बहन की एक संतान को गोद लिया और उसका नाम धुंधकारी रखा। गाय से भी एक मानव पुत्र हुआ। ब्राह्मण ने उसका नाम गोकर्ण रखा। समय के साथ धुंधकारी में राक्षसी प्रवृति बढ़ती गई। उसके इस स्वभाव से पिता ब्राह्मण दु:खी हुए और घर-द्वार त्याग कर ध्यान के लिए वन चले गए।

इधर, धुंधकारी घर में वेश्याओं को लाकर रखने लगा। धुंधकारी की मां धुंधली भी परलोक सिधार गई। गोकर्ण संन्यासी बन गए। वेश्याओं ने धुंधकारी को भी मार डाला और वह प्रेत बन गया। गोकर्ण जब संन्यासी बनकर गांव लौटे, तब भी धुंधकारी प्रेत बना हुआ था। उसकी मुक्ति के लिए गया आदि जाकर श्राद्ध किया, फिर भी उसे मुक्ति नहीं मिली। तब सूर्यदेव की कृपा से उन्होंने भागवत कथा करवाई। भागवत श्रवण के साथ ही धुंधकारी प्रेत योनि से मुक्त हुआ। सूत महाराज कहते हैं कि भागवत कथा में इतना प्रताप और सामर्थ्य है कि इसके श्रवण से प्रेत योनि को भी मुक्ति प्राप्त होती है, तो मानव जीवन का क्या कहना।

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