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सब्जियों को धोने में नहीं बरते लापरवाही ब्रेन में इंफेक्शन होने पर आ सकते हैं दौरे और वॉमिटिंग

3 वर्ष पहले
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हेल्थ रिपोर्टर रांची



सब्जियों और फ्रूट्स को धोने में बरती गई लापरवाही हेल्थ के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। इन्हें अच्छी तरह से नहीं धोने से सीनियम सेलियम टेप वॉर्म (कीड़े या परजीवी) ब्लड के जरिए आंतों से ब्रेन तक पहुंच जाते हैं। इनसे ब्रेन में इंफेक्शन होने से न्यूरोसिस्टसरकोसिस बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यह इंफेक्शन मिर्गी में तब्दील हो सकता है। वहीं, ब्रेन में फ्लयूड का सर्कुलेशन रुकने से पेशेंट की डेथ तक हो सकती है। ज्यादातर लोगों में इसके बारे में अवेयरनैस नहीं होने की वजह से यह प्राइमरी स्टेज पर डायग्नोस नहीं हो पाती है।

दौरे शुरू होने पर यह बीमारी का मालूम चल पाता है। हरी सब्जियां सहित सलाद में इस्तेमाल होने वाला खीरा, गाजर, टमाटर, पत्ता गोभी में ये टेप वॉर्म पाए जाते हैं। कई बार लोग इन्हें पानी से साफ किए बिना खा लेते हैं, जिसके चलते ये जाने-अंजाने में आंतों से होते हुए ब्रेन में पहुंच जाते है। इनसे ब्रेन में इंफेक्शन हो सकता है।

आंतों को नहीं पहुंचाते नुकसान

ये पैरासाइट्स आंतों से अलग-अगल टिश्यू में जम जाते हैं। इससे लंग्स, लिवर और अन्य ऑर्गेन्स में सिस्ट बन जाती है। ब्रेन में जाने से मिर्गी, लंग्स में क्रॉनिक इंफेक्शन और ट्यूमर बनता है। इससे खांसी के साथ ब्लड आता है। हालांकि, आंताें में इनसे किसी तरह का नुकसान नहीं होने से लक्षण नहीं आ पाते हैं।

-डॉ. सीबी सहाय, न्यूरो सर्जन, रिम्स, रांची

रीढ़ की हड्डी में टेपवॉर्म पहुंचने से हाथ-पैर हो जाते हैं सुन्न

समय पर इलाज शुरू नहीं होने पर ये टेप वॉर्म ब्रेन से स्पाइनल कॉर्ड तक पहुंच जाते हैं। इससे कमर दर्द, हाथ-पैर में सुन्नपन और कमजोरी आ सकती है। टॉक्सिन ज्यादा निकलने से डेथ रिस्क भी बढ़ सकती है। ये ब्रेन में पानी का सर्कुलेशन रोक देते है। वहीं, हाइड्रोसिस्ट होने से सिर में पानी भर सकता है। सिर में दर्द, दौरे ज्यादा आना और आंखाें की रोशनी कम हो सकती है। इसलिए समय पर इलाज करवाना जरूरी है।

टॉक्सिन रिलीज होने से ब्रेन में रहती है सूजन

ब्लड टेस्ट से डायग्नोस नहीं होती यह बीमारी

ब्रेन में इंफेक्शन होने पर सिर दर्द रहता है। बार-बार दौरे आना, माइग्रेन की तरह हमेशा दर्द रहना और वॉमिटिंग होती है। शुरूआत में पेशेंट्स को इसी तरह महसूस होता है। ब्लड टेस्ट से इस बीमारी को डायग्नोस नहीं किया जा सकता है। सीटी स्कैन और एमआरआई से ही इस बीमारी का डायग्नोस संभव है।

ब्रेन में ये टेपवार्म जब तक जिंदा रहते हैं। तब तक ब्रेन में दर्द रहता है। इन्हें खत्म करने के लिए चार से छह सप्ताह तक दवाइयां दी जाती हैं। ये दवाइयां लेने पर पैरासाइट्स मरने पर ब्रेन में टॉक्सिन रिलीज करना शुरू कर देते हैं। टॉक्सिन की वजह से ब्रेन में सूजन रहने से दर्द महसूस होता है। साथ ही फिट्स ज्यादा आते हैं। सूजन कम करने के लिए चार से छह सप्ताह तक स्टीरॉयड की लो डोज दी जाती है। ये पैरासाइट्स डेड होने के बाद ब्रेन में रहते हैं, लेकिन इनकी बड़ी सिस्ट बनने पर सर्जरी करके बाहर निकाला जाता है।

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