साधारण घरों में भी हो सकते हैं सुपर हीरो!
यह आवश्यक नहीं कि सारे सुपर हीरो महंगे मकानों में रहते हों। ऐसे कई हैं जो साधारण घरों में पाए जाते हैं, भीड़ में छिपे हुए। करुणा और दया उनकी सुपर पावर होती है। ठीक ऐसा कोई मुंबई के उपनगर कुर्ला में रहता है, जहां रहने वाला हर व्यक्ति किसी बेहतर जगह जाना चाहेगा।
नब्बे पार के दशक के उत्तरार्ध तक वे बिज़नेसमैन हुआ करते थे और उन्हें एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने का 15 साल का अनुभव था। सबकुछ ठीक चल रहा था और फिर एक दिन उन्होंने एक टेंडर में गलत कीमत भर दी और उनकी कंपनी को बहुत बड़ा नुकसान हो गया। इस मूर्खतापूर्ण गलती का सीधा परिणाम यह हुआ कि उन्हें कंपनी छोड़कर जाने को कह दिया गया। तब जाकर उन्हें अहसास हुआ कि उनकी सुनने की क्षमता के साथ कुछ बहुत ही गलत बात है। नजांच में पता चला कि उन्हें ‘टिनाइटस’ है यानी कान की ओर जाने वाली धमनियों कठोर हो गई हैं। इसमें ऐसे लगता है जैसे किसी के कान में लगातार घंटी बजने की आवाज या भनभनाहट होती रहे। उन्हें सर्जरी की सलाह दी गई। हालांकि, इससे कोई फायदा नहीं हुआ। इससे उनका डिप्रेशन बढ़ गया और जल्दी ही उन्हें आत्महत्या के खयाल आने लगे। इस कठिन दौर से गुजरते हुए उन्होंने हार मानने से इनकार कर दिया।
वे अपने उदाहरण से नेतृत्व देने में विश्वास करते हैं। इसलिए उन्होंने मुंबई के एक कॉलेज से लेखन और फोटोग्राफी में हाथ आजमाने का निश्चय किया। कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने जितने फोटो खींचे वे बहुत अच्छे आए और वही धीरे-धीरे उनका जुनून बनने लगा। लेकिन, लेंस के पीछे अपना जुनून खोजना, सुनने की तकलीफ भुलाने के लिए पर्याप्त नहीं था। वे जितना इतके बारे में सोचते, उतना चिंतित होते और उसी समय संयोग से उन्होंने एक अन्य उपनगर गोरेगांव में सुनने की तकलीफ वालों का स्कूल ‘संस्कारधाम’ देखा। वे सिर्फ यह चाहते थे कि ये बच्चे बढ़े होते हुए आत्मनिर्भर बने और इसलिए उन्होंने उन बच्चों को फोटोग्राफी सिखाने की पहल की।
राजेन्द्र नायर से मिलिए, जिन्हें मित्रों व परिवार में प्यार से राजेन कहा जाता है। वे लगभग दो दशक से फोटो-जर्नलिस्ट हैं। उन्होंने सुनने में तकलीफ से परेशान धारावी के बच्चों को एक एनजीओ के सहयोग से फोटोग्राफी पढ़ाना शुरू किया। अन्यथा आमतौर पर किसी पेशेवर फोटोग्राफर की सेवाएं लेना आर्थिक रूप से इन बच्चों के बस की बात नहीं थी। सुनने में परेशानी वाले बच्चों को पढ़ाने का यह काम बधीरों के एक स्कूल में हर वीकेंड तीन साल तक चलता रहा। कुछ वर्षों में नायर वैश्विक स्तर पर फोटोग्राफरों का एक नेटवर्क बनाने में कामयाब रहे, जिन्हें वे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रूस और यूरोपीय देशों से समाज के वंचित तबकों के इन बच्चों को पढ़ाने के लिए आमंत्रित करते हैं।
2013 से वे टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में कैंसरग्रस्त बच्चों को पढ़ाने लगे, जो पिछले पांच वर्षों से जारी है। मुंबई में कोई गली ऐसी नहीं है, जिसकी ज़िंदगी को उनके कैमरे ने न पकड़ा हो। वे बार-बार लेंस से नए एंगल पकड़ने वहां जाते हैं और बच्चों को भी अपनी आंखों से देखकर सीखने का मौका देते हैं। हो सकता है उनमें से कई फोटोग्राफी को पेशे के रूप में न अपनाए लेकिन, कई बच्चे जो उनके साथ काम करते हैं उन्हें उनके अासपास की दुनिया को अलग कोण से देखने का प्रशिक्षण तो मिल गया और उन्हें ढालने तथा ठीक-ठाक आजीविका खोजने के लिए इतना पर्याप्त है। कम से कम उनके लिए राजेन सुपरहीरो हैं, जिन्होनंे उनकी ज़िंदगी को रंगीन बनाया है।
फंडा यह है कि  जरूरी नहीं सुपरहीरो हवेलियों में रहे, वे साधारण घरों से आकर भी किसी की ज़िंदगी को हवेली की ज़िंदगी बना सकते हैं।
मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर
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एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु
raghu@dbcorp.in
साढ़े तीन करोड़ से पहला स्मार्ट कोच जून में हो जाएगा तैयार
होटल जैसा अहसास देंगे रेलवे के नए स्मार्ट कोच
डीबी स्टार | जमशेदपुर/रांची
भारतीय रेल में स्मार्ट कोच का युग जल्द शुरू होने जा रहा है। कपूरथला, पंजाब स्थित रेल कोच फैक्टरी (आरसीएफ) ने देश के पहले स्मार्ट कोच का निर्माण शुरू कर दिया है। इसमें एशो-आराम की वे सभी सुविधाएं मुहैया होंगी, जो अमूमन हवाई जहाज और फाइव स्टार होटलों में हुआ करती हैं। साढ़े तीन करोड़ रुपए की लागत से बनने जा रहा पहला कोच जून तक तैयार हो जाएगा। स्मार्ट कोच में सभी अत्याधुनिक सुविधाएं होंगी। कॉल बेल, वाई-फाई, एलईडी लाइट्स, आरामदायक सीट, सेंटर टेबल, मोबाइल व लैपटॉप चार्जिंग के अलावा खिड़कियों पर कंप्यूटराइज्ड ऑटोमैटिक पर्दे लगे होंगे, जिन्हें रिमोट के जरिए उतारा-चढ़ाया जा सकेगा। कोच के बाहर इलेक्ट्रानिक रिजर्वेशन चार्ट लगेगा। ऑटोमैटिक कंपैक्ट अरेंजमेंट वाले डस्टबिन लगेंगे।
स्मार्ट कोच में प्रत्येक सीट के पीछे एलईडी स्क्रीन नहीं लगेगी, बल्कि इंटरनेट के जरिए यात्रियों के स्मार्ट फोन को ही कोच के इंटरटेनमेंट सिस्टम से जोड़ दिया जाएगा। यात्री अपनी मर्जी के मुताबिक करीब 60 तरह के कार्यक्रम देख सकेंगे।
साउंड व डस्टप्रूफ होगा कोच : यह कोच साउंड व डस्टप्रूफ होगा। यानी इसमें न तो बाहर का शोर-शराबा सुनाई देगा और ना ही धूल अंदर आ सकेगी। कोच के दरवाजे भी ऑटोमैटिक होंगे। ट्रेन के चलते ही दरवाजे खुद-ब-खुद बंद हो जाएंगे। शौचालय व बाहरी दरवाजों वाली जगह से कोच के सीटों वाले हिस्से में जाने के लिए भी दोनों तरफ सेंसर युक्त ऑटोमैटिक दरवाजे होंगे। दरवाजे के सामने पहुंचने पर यह अपने आप खुल जाएगा।
जीपीएस से लैस होगा कोच : यह कोच ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) से लैस होगा। ट्रेन कितनी देर में पहुंचेगी, कितनी लेट चल रही है और कौन सा स्टेशन कितनी देर में आएगा, आदि जानकारी यात्री कोच में लगी स्क्रीन पर देख सकेंगे। कोच में हाई स्पीड वाई-फाई इंटरनेट की सुविधा मिलेगी और हर कोच में लगे सीसीटीवी कैमरे कोच की निगरानी करेंगे। पढ़ने आदि के लिए सीटों पर एलईडी बल्ब की व्यवस्था भी होगी।
स्मार्ट फोन जुड़ेगा इंटरटेनमेंट सिस्टम से
ऑटोमैटिक कंपैक्ट अरेंजमेंट डस्टबिन : इस कोच में ऑटोमैटिक कंपैक्ट अरेंजमेंट डस्टबिन लगेंगे, जिनकी क्षमता सामान्य से 10 गुना बढ़ जाएगी। यह डस्टबिन कचरे को खुद-ब-खुद क्रश कर (कुचल) देगा। हवाई जहाज की तरह इस कोच में वैक्यूम टॉयलेट होंगे। इसमें सेंसर युक्त आधुनिक नल, हैंड ड्रायर व सोप डिस्पेंसर लगा होगा। सेंसर से ही यह नल चलेगा और बंद होगा। वैक्यूम टॉयलेट से पानी की खपत लगभग दस फीसदी रह जाएगी। स्मार्ट कोच में लगाए जाने वाले टैंक में पानी का स्तर बताने के लिए एक गेज भी लगाया जाएगा।
केयू के कॉलेजों में करोड़ों की लागत से बने भवन में
6 माह के अंदर पड़ी दरारें
डीबी स्टार | जमशेदपुर/रांची
कोल्हान विश्वविद्यालय के अंगीभूत कॉलेज में हाल के वर्षों में हुए भवन निर्माण में लगातार लापरवाही का मामला प्रकाश में आ रहा है। इसका अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि बीते तीन साल में तीन कॉलेजाें में हुए करोड़ों रुपए से बने भवनों में दरारें पड़ गई हंै। सबसे चौकाने वाला मामला एबीएम कॉलेज का है। इसमें छह महीने के अंदर ही नए भवन के दीवारों में दरार पड़ने लगा है। नये भवन में दरारों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यहां तक कि इस भवन की छत का प्लास्टर टूट कर गिर रहा है। सब स्पष्ट दिख रहा है। इस कारण कॉलेज प्रबंधन द्वारा कॉलेज की कक्षाओं को प्रारंभ करने तथा अन्य कार्य की शिफ्टिंग के प्रस्ताव को रोक दिया गया है। बताया जा रहा है कि इस अनियमितता की शिकार प्राचार्य डॉ. मुन्द्रिता चन्दा ने फोटो सहित विश्वविद्यालय को शिकायत की है। ऐसे में नये भवन में कॉलेज के शिफ्टिंग का प्रस्ताव फिलहाल लटक गया है। इस संबंध में विश्वविद्यालय से मार्ग दर्शन के बाद भी कार्य हो सकता है। एबीएम कॉलेज के नये भवन के निर्माण में सरकार की लगभग चार करोड़ की राशि खर्च हुई है।