सत्संग में भक्ति, ज्ञान और कर्म को समझें : माधवानंद
चिन्मय मिशन रांची के आचार्य स्वामी माधवानंद ने कहा कि प्रयाग गंगा, यमुना और सरस्वती इन तीन नदियों का संगम है। इसमें स्नान कर लोग जीवन की पूर्णता का अनुभव करते हैं। उसी तरह सत्संग में भक्ति, ज्ञान और कर्म के माध्यम से गोते लगाकर लोग खुद को धन्य समझते हैं। क्योंकि, सत्संग से ही बुद्धि, कीर्ति और यश की प्राप्ति संभव है। शनिवार को शिव साईं मंदिर न्यू एजी कॉलोनी कडरू में 10-14 अप्रैल तक आयोजित रामचरितमानस के प्रवचन के प्रसंग में कही। उन्होंने शनिवार को प्रयाग राज की महिमा का बखान किया।
चिन्मय मिशन में 11-15 अप्रैल तक आयोजित प्राणायाम, ध्यान और पंचदशी के प्रात:कालीन कार्यक्रम के चौथे दिन शनिवार को स्वामी माधवानंद ने पंचदशी पर विशेष प्रकाश डाला। पंचदशी के षष्ठ अध्याय से चित्रदीप प्रकरण के संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि जैसे वस्त्र में रंग देने पर पहाड़, नदी, मनुष्य या पशु पक्षी बनते हैं। ये सब रंग के कमाल होते हैं। जो वस्तु के उपर रंग का आभास होता है। उसी तरह परमात्मा में सारा जगत आभास है। ज्ञान होने पर आभाष नष्ट नहीं होता है, उसकी प्रतीति रहती है।
बिना सत्संग के विवेक और ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती
स्वामी माधवानंद ने कहा कि बिना सत्संग विवेक और ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। उसी तरह रामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सुलभ भी नहीं होता। संत संगति ही आनंद मंगल का मूल है। क्योंकि, सत्संग लाभ और सिद्धि है। स्वामी माधवानंद ने कहा कि जिस तरह पारस लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही दुष्ट भी सत्संग के संपर्क में आकर संत बन जाते हैं। कभी-कभी स्थिति विपरीत भी होती है। संत भी कुसंगति में कुसंगी हो जाते हैं। जिस तरह बारिश के दिनों में ओले फसल को नष्ट कर देते हैं, उसी तरह दुष्ट अच्छे लोगों को नष्ट करते हैं।
मेहनत और ईमानदारी से किया गया कोई काम छोटा नहीं होता : उमेश भाई जानी
रांची | श्रीमद् भागवत कथा वाचक उमेश भाई जानी ने कहा कि मेहनत और ईमानदारी से किया गया कोई भी काम छोटा नहीं होता है। छोटे तो हमारे विचार होते हैं और देखने का हमारा नजरिया होता है। वह केशव कुंज चौहान परिवार द्वारा पटेल समाज भवन लालपुर में सात अप्रैल से चल रहे श्रीमद् भागवत कथा में प्रवचन दे रहे थे। कथा 14 अप्रैल तक चलेगी। छत्तीसगढ़ भिलाई से पधारे उमेश भाई जानी ने व्यासपीठ से कहा कि भगवत गीता में प्रभु कृष्ण हमें कर्म करने को प्रेरित करते हैं। इस संदेश में प्रभु कृष्ण हमें सकारात्मक सोच और नई उत्साह के साथ पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने को प्रोत्साहित करते हैं।
उन्होंने कहा कि राजसूर्य यज्ञ में कृष्ण जूठा पत्तल उठाते हैं। जूठा पत्तल उठाकर वे छोटे नहीं हो गए, बल्कि उन्होंने अपने इस कार्य से हमें संदेश दिया कि मेहनत और ईमानदारी से किया गया कोई कार्य छोटा नहीं होता है। उन्होंने प्रत्येक कार्य में सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने पर भी जोर दिया।