झारखंड की दो प्रमुख धार्मिक संस्था ने रमजान में प्रति व्यक्ति निकाले जाने वाले सदका-ए-फित्र का एेलान किया है। इमारत शरीया ने 40 रुपए और एदार-ए-शरीया ने प्रति व्यक्ति 54 रुपए वंचितों के बीच अदा करने की अपील की है। इस संबंध में दोनों संगठनों की अलग-अलग हुई बैठक में विचार-विमर्श के बाद फित्र की रकम तय की गई। इस्लामी मरकज हिंदी पीढ़ी में एदारा के नाजिम आला मौलाना कुतुबुद्दीन रिजवी की अध्यक्षता में उलमा-ए-कराम की बैठक हुई। इसमें कहा गया कि शरीयत के अनुसार हर बालिग और नाबालिग को फित्र देना वाजिब है। इसके लिए प्रति व्यक्ति 2 किलो 45 ग्राम गेहूं या इसकी कीमत निकाल कर जरूरतमंदों को अदा करना जरूरी है। मौलाना कुतुबुद्दीन रिजवी ने कहा है बेहतर और अफजल यह है कि आदमी जिस कीमत के गेहूं का इस्तेमाल करता है, उसी के अनुसार उसकी कीमत निकालनी चाहिए। रांची के बाजारों में मध्यम श्रेणी के गेहूं की कीमत 26 प्रति किलो है। 2 किलो 45 ग्राम गेहूं की कीमत 53 रुपए कुछ पैसे होते हैं। इसे रांची व आसपास के लिए एहतियात के तौर पर 54 किया गया है। बैठक में दारुल कजा के नायब काजी मुफ्ती फैजुल्ला मिस्बाही, मौलाना जसीम उद्दीन खान अंबर, कारी मोहम्मद अय्यूब रिजवी, अकीलुर्रहमान, नायब मोहतमिम मौलाना मुजीबुर्रहमान, मौलाना नूर आलम, मौलाना गुलाम फारूक मिस्बाही आदि मौजूद थे।
बैठक में मौलाना कुतुबुद्दीन रिजवी, मुफ्ती फैजुल्ला मिस्बाही, मौलाना जसीम उद्दीन खान अंबर व अन्य।
नाबालिग की तरफ से गार्जियन करें अदा : कास्मी
इधर, इमारत शरीया रांची के कार्यालय परिसर में अपर बाजार जामा मस्जिद के इमाम-खतीब मौलाना सिद्दीक मजाहिरी की अध्यक्षता में बैठक हुई। इसमें प्रति व्यक्ति 40 रुपए सदका-ए-फित्र अदा करने का एेलान किया गया। दारुलकजा के काजी-मुफ्ती अनवर कास्मी ने बताया कि जितनी जल्द हो, सदका-ए-फित्र अदा कर देना चाहिए। ईद का इंतजार नहीं करना चाहिए। नाबालिग की तरफ से उनके अभिभावक को अदा करना है। बैठक में मौलाना अबुल कलाम शमसी, मौलाना डाॅ. उबैदुल्लाह कास्मी, मुफ्ती डाॅ. सलमान कास्मी, मौलाना डाॅ. असगर मिस्बाही, मौलाना रिजवान अहमद कास्मी, हाफिज शमीम अहमद, मौलाना रफीक आलम मजाहिरी, मौलाना उमर फारूक कास्मी, हाजी शकील अहमद, अहमद तनजील समेत कई आलिम शामिल हुए।
पैगंबर-ए-इस्लाम हुजूर अकरम हजरत मोहम्म्द (सल्ल.) अपने मीठे बात-व्यवहार से लोगों का दिल जीत लेते थे। उन्होंने फरमाया है कि अल्लाह के पास रंग और नस्ल का कोई वजूद नहीं। सभी इंसान हैं, तो लोगों के जेहन से यह भ्रम निकल गया कि वे अच्छी नस्ल के हैं। (हदीस)
वंचित गरीब की भूख और प्यास की शिद्दत करें महसूस
रोजा का फलसफा महज भूखे या प्यासे रहना नहीं, बल्कि अपने नफ्स पर काबू करना है। भूख-प्यास की शिद्दत को महसूस करना है। उसके बाद गरीबों-मिस्कीनों की मदद करना भी है। अल्लाह तबारक तआला ने इसी माहे मुबारक में कुरआन-ए-मुकद्दस को नाजिल फरमाया। हमें इस बरकतों व रहमत भरे रमजान की खूब कद्र करनी चाहिए। इस्लाम ने मां के कदमों तले जन्नत कहा है, वहीं पिता को जन्नत का दरवाजा। इस पहलू को हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हुजूर (स.) का इरशाद है कि वह आदमी जलील हो, जलील हो, जलील हो। लोगों ने पूछा, कौन है वो आदमी। आपने कहा, जिसने मां-बाप को बुढ़ापे की हालत में देखा और उनकी खिदमत न की। रमजान गमख्वाहरी, बरकत, रहमत, सब्र, मगफिरत और खैरख्वाही का महीना है। (लेखक कांटाटोली जामा मस्जिद के इमाम व खतीब हैं।)
मौलाना मंजूर हसन बरकाती
नन्हे रोजेदार की कहानी
पहला रोजा में लगा जान चली जाएगी
छोटे-छोटे बच्चे भी रमजान में रोजा रख लेते हैं। घर में भैया-बाजी को भी रोजा रखते देखती थी। तब रोजा यही समझ में आता था कि सुबह होने से पहले सेहरी में कुछ खाया जाता है, फिर शाम में भी अम्मी बहुत अच्छी-अच्छी चीजें बनाती हैं। अम्मी-अब्बू (मोजाहिद इस्लाम-तबस्सुम इस्लाम) से रमजान के बारे में सुनती थी। अब जब पांच साल की हो गई, तो कुछ-कुछ रोजा के बारे में समझा। जब समझ में आया, तो पहली बार रोजा रखने का इरादा भी कर लिया। अम्मी-अब्बू को बताया तो वे खुश हो गए। हालांकि, मुझे खुशी के साथ थोड़ी-थोड़ी घबराहट भी हो रही थी। लेकिन इंतजार था, तो बस सेहरी का। रात में जल्दी सो गई। अम्मी ने उठाया कहा- सेहरी कर लो। सेहरी के बाद पापा-मम्मी ने रोजे की नियत बताई। (लेखिका बिशप वेस्टकॉट गर्ल्स स्कूल, डोरंडा में क्लास वन की छात्रा हैं।)
मरियम इस्लाम
रमजान-उल-मुबारक