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चंद्रमा पर जाने, मंगल पर बसने की बजाए मन की शांति के लिए बैकुंठ की खोज करें

3 वर्ष पहले
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चुटिया के अयोध्यापुरी में नवनिर्मित वृंदावनधाम में श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में तीसरे दिन शुक्रवार को संत श्री मनीष महाराज ने भक्तों को कल्याण और मन की शांति की कथा सुनाई। कहा कि भक्तों का कल्याण व मन की शांति तभी मिलेगी, जब आप ईश्वर को पाएंगे। उन्होंने कहा कि भागवत कथा जगाने का काम करती है। यह कहता है जागते रहो और ईश्वर को भजो। जो जागता है, वह ईश्वर को पाता है और जो सोता है, वह सबकुछ खो देता है। उन्होंने कहा कि आज लोग चंद्रमा पर जाने और मंगल पर बसने की बातें करते हैं, लेकिन मन की शांति के लिए बैकुंठ की खोज नहीं कर रहे हैं। जबकि, कल्याण और मन की शांति तभी मिलेगी, जब आप ईश्वर को पाएंगे। जीवात्मा का धरती पर आने का मकसद क्या होता हैं, यह सवाल रखते हुए कहा कि जब कोई जीवात्मा उस उद्देश्य को भूल जाता है, तो उसे क्या-क्या कष्ट उठाने पड़ते हैं? जीवन में उत्पन्न होने वाले विषादों का विनाश ज्ञान से ही संभव है। उन्होंने कहा कि महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन के मन में जब विषाद का जन्म हुआ, तब भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान से उसके मन में उपजे भ्रम व विषाद को समाप्त किया। मनुष्य जीवन को दुर्लभ व क्षणभंगुर बताते हुए कहा कि चार दिन की जिंदगी से कुछ पल ईश्वरी प्रेम के लिए निकालें और जीवन को प्रकाशवान करें।

भक्तों को कल्याण और मन की शांति की कथा सुनाते संत मनीष महाराज।

बिना संयम के शां‍ति संभव नहीं है व बिना विष निकले अमृत की प्राप्ति संभव नहीं है : पंडित विष्णु पाठक

रांची | श्रीकृष्णानुरागी पंडित शिवम विष्णु पाठक ने कहा कि बिना सत्संग के विवेक संभव नहीं है। बिना संयम के शां‍ति संभव नहीं है और बिना विष निकले अमृत की प्राप्ति संभव नहीं है। कथा के माध्यम से भक्ति के सिद्धांतों का वर्णन करते हुए उन्होंने यह भी बताया कि सहिष्णुता भक्त की पहली निशानी है। वह हरमू रोड स्थित श्री श्याम मंदिर में श्रीमद् भागवत कथा सुना रहे थे। शिवम विष्णु पाठक ने जड़ भरत चरित्र और अठाइस प्रकार के नरकों का वर्णन किया। श्री व्यास जी द्वारा प्रसंगों से श्रद्धालु भी अभिभूत हुए। इस दौरान मंदिर परिसर श्री राधे, श्री राधे के जयकारों से गूंजता रहा। भक्त प्रह्लाद और श्री नरसिंह प्रभु के प्रादुर्भाव के प्रसंग से भक्तों ने जाना कि अगर विश्वास पक्का हो भक्त का, तो प्रभु खंभे से भी प्रकट होते हैं।

आत्मा अव्यक्त, अचिंत्य व अविनाशी है : माधवानंद

रांची | आत्मा अविकारी है। जिस तरह मनुष्य पुराने व फटे कपड़े त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी तरह जीवात्मा एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण करता है। यही जन्म और मृत्यु है। उक्त बातें चिन्मय मिशन के आचार्य स्वामी माधवानंद महाराज ने कही। वे शुक्रवार को एमजी रोड स्थित श्रीश्री मां आनंदमयी आश्रम में श्रीमद् भगवत गीता कथा सुना रहे थे। द्वितीय अध्याय के चौथे दिन शुक्रवार को प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य के लिए शरीर भोग का क्षेत्र है। जब मनुष्य की भोग व वासना खत्म होती है, तो शरीर छोड़ना पड़ता है। फिर इस शरीर की आवश्यकता नहीं होती है। भले ही वह शरीर कुमारावस्था का हो या बाल्यावस्था का। प्रश्न मुद्रा में उन्होंने कहा कि एक घर जलने पर उस घर में रहने वाले लोग भी जल जाते हैं, तो क्या शरीर के नष्ट होने पर शरीर में रहने वाली आत्मा नष्ट होगी या नहीं।

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