कठोपनिषद में एक सुंदर कथा है। नचिकेता और उसके पिता वाजश्रवा तथा यमराज के बीच संवाद का। जिस बालक को उसके पिता नहीं समझ पाए, उसको यमराज ने परीक्षा लेकर गुरु की तरह ज्ञान दिया। जीवन में अहंकार हमको बड़ा, सरल और प्रज्ञावान नहीं होने देता है। चाहे हम बड़े पद पर रहे या छोटे पद पर। अहंकार हमारे साथ सदैव रहता है, जैसे वाजश्रवा के साथ था। कथा है कि पिता वैसे गायों को दान कर रहे हैं, जो दूध नहीं देती। इस पर नचिकेता सवाल उठाता है कि इसका दान क्यों? दान में तो प्रिय और समाज के उपयोगी वस्तु को देना चाहिए। लेकिन यह अहंकारी मन गरीब को रोटी, भीखमंगा को चंद रुपए और ईश्वर को मिष्ठान का भोग लगाकर संतुष्ट हो जाता है। क्या हम जीवन में ऐसे ही कर्म के आधार पर यश, कीर्ति एवं लाभ की आकांक्षा नहीं रखते हैं? नचिकेता मन में विचारता है कि बहुतों में मैं प्रथम श्रेणी के आचरण पर चलता आया हूं और बहुतों में मध्यम श्रेणी के आचरण का पालन करता हूं। कभी भी निचले स्तर पर आचरण नहीं किया। फिर भी पिताजी ऐसा क्यों करते है? नचिकेता सवाल उठाता है कि धान की तरह यह मानव जीवन पक कर गिर जाता है और उसी की तरह फिर पैदा होता है। ऋतुएं आती हैं और चली जाती हैं। फसल उगती है, बीज गिरते हैं फिर अंकुर होते हैं तथा फसल पकती है और बीज गिरते हैं। यह एक वर्तुल है। जब सबकुछ क्षणभंगुर और परिवर्तनशील है तो जीवन को सत्य के अनुकूल बनाना चाहिए। सत्य के प्रति प्रेम के कारण नचिकेता का मन और हृदय निर्भय हो गया था। यह इंद्रिय स्वभाव है जो मनुष्य को सत्य और धर्म से दूर करता है। जब मनुष्य अपने को देह और इंद्रियों का एक संचय मान लेता है तो वह काम, भय और लोभ के वृत्त में ही घूमता रहता है।
सत्य के प्रति निर्भय प्रेम को हेय दृष्टि से देखा जाता है, तब कठोपनिषद के माध्यम से नचिकेता समय का सूर्य बनकर हमारे सामने आता है। पिता द्वारा मृत्यु को दान देने की बात को वह स्वीकार करता है और यमराज से मिलने चल देता है। तीन दिन की प्रतीक्षा के बाद यमराज उससे मिलते हैं तो नचिकेता की दृढ़ता और सत्य पर अडिग रहने के एवज में तीन वरदान देते हैं। नचिकेता के सवाल और यमराज के जवाब यानी वरदान आज के गुरु और शिष्य के लिए शिक्षा के उत्कृष्ट मानदंड बन सकते हैं। यमराज हर सवाल के साथ नचिकेता की परीक्षा लेता है और परीक्षा में सफल होने पर सवाल का समुचित जवाब देता है।
यमराज अगर दाता हो, तो कोई संसार का संपूर्ण ऐश्वर्य मांग बैठे! स्वर्ग और संपूर्ण समृद्धि की कामना करने लगे। लेकिन आदर्श बालक कैसा हो? इसको भारतीय जीवन में नचिकेता ने प्रतिस्थापित किया। उन्होंने पहला वरदान मांगा कि मेरे पिता शांत हो जाएं और जब मैं लौटूं तो मुझे पुत्रभाव से प्रेमपूर्वक स्वीकार करें। दूसरा वर के रूप में उस ज्ञान की जानकारी चाहता है, जिससे स्वर्ग का सौंदर्य मनुष्य की हथेली पर होता है। इसके बाद यमराज ने नचिकेता को उस यज्ञ विद्या का ज्ञान दिया, जिसे पा लेने के बाद मनुष्य के पास ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं होती है।
नचिकेता सोचता है कि लंबी उम्र भी अल्प है, सुख का क्षय होना है, जीवन रोज बीत रहा है तो मात्र वरदान से क्या लाभ होगा? वह तीसरे वरदान के रूप में आत्मतत्व पर सवाल करता है। इस सवाल का जवाब क्या मिलता है- उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत, क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्गं पथस्पद् कवयो वदन्ति(1.3.14)। स्वामी विवेकानंद का भी यह प्रिय मंत्र था। उपनिषद के ऋचाकार आहवान कर रहे हंै कि ज्ञान प्राप्त करना ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य होना चाहिए।़ लेकिन इसका मार्ग दुर्गम है तो विद्वानों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करें।
उपनिषद कथा- कठोपनिषद
डाॅ. मयंक मुरारी, चिंतक-लेखक, रांची
ज्ञान प्राप्त करना ही हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य होना चाहिए, अगर इसका मार्ग दुर्गम है तो विद्वानों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करें