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बच्चा बेचने में दंपती और चैरिटी के बीच दलाली करनेवालों की तलाश

3 वर्ष पहले
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मिशनरीज ऑफ चैरिटी के ईस्ट जेल रोड स्थित निर्मल हृदय से बच्चा बेचे जाने के मामले में पुलिस अब उन दलालों के नाम भी जानना चाहती है, जिन्होंने दंपती और चैरिटी के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पुलिस की योजना है कि सिस्टर कोनसिलिया और अनिमा इंदवार को रिमांड पर लिया जाए, ताकि दोनों को आमने-सामने बैठाकर पूरे सिंडिकेट से पर्दा हटाया जा सके। वहीं पूछताछ के बाद मुक्त की गई एक अन्य सिस्टर मेरिडियन को रांची छोड़ने से मना किया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया जा सके।

बताते चलें कि जेल भेजने से पूर्व पुलिस पूछताछ में ईस्ट जेल रोड मिशनरीज ऑफ चैरिटी की सिस्टर कोनसिलिया ने स्वीकार किया था कि उसने दो बच्चों को 50-50 हजार रुपए में और एक को 1.20 लाख रुपए में बेचा था। एक बच्चे को सिमडेगा के दंपती को बिना पैसे लिए ही दे दिया था। पुलिस को कोनसिलिया और जेल भेजी गई दूसरी सिस्टर अनिमा इंदवार के पास से 1.49 लाख रुपए भी मिले थे, जो बच्चे बेचने के मद में कमाए गए हैं।

दो दिन पहले पैदा हुआ बच्चा स्पेशल केयर यूनिट में

सदर अस्पताल में जिस विक्षिप्त महिला ने शुक्रवार की रात बच्चे को जन्म दिया था, उस बच्चे की नानी अगर देखभाल में सक्षम नहीं होगी, तो उसकी सहमति से सीडब्ल्यूसी बच्चे को अपनी कस्टडी में लेगी। फिलहाल बच्चे को स्पेशल केयर यूनिट में रखा गया है। इसलिए कुछ दिनों में स्थिति सामान्य होने पर इस संबंध में आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं जिस बच्चे को बेचने के बाद मामला पकड़ में आया है, उसे सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (कारा) में रजिस्टर्ड किया जाएगा।

मदर के घर से बच्चों का सौदा
निर्मल हृदय से बच्चा बेचे जाने के मामले में अब पुलिस ने सिस्टर मेरिडियन को रांची में ही रहने को कहा, ताकि पूछताछ के लिए कभी भी बुलाया जा सके
जिस बच्चे को बेचा गया था उसे कारा में रजिस्टर्ड किया जाएगा
हिनू से जिन बच्चों को कस्टडी में लिया गया था उनमें से कुछ के अभिभावक पहुंचे सीडब्ल्यूसी ऑफिस।

बच्चों के अभिभावक पहुंचे सीडब्ल्यूसी कार्यालय
मिशनरीज ऑफ चैरिटी के हिनू स्थित शिशु सदन से शुक्रवार को सीडब्ल्यूसी की टीम ने 22 बच्चों को अपनी कस्टडी में लिया था। शनिवार को इनमें से कुछ बच्चों के अभिभावक सीडब्ल्यूसी कार्यालय पहुंचे। ज्यादातर अभिभावक खूंटी जिले के थे। उन्होंने अपने बच्चों की जानकारी लेकर उसे वापस ले जाने की बात कही। इस पर सीडब्ल्यूसी की अध्यक्ष रूपा कुमारी ने कहा कि सभी बच्चे ठीक हैं। उनसे मिलना चाहते हैं तो अभी मिल सकते हैं। लेकिन, बच्चा वापस लेने के लिए कम-से-कम एक माह का इंतजार करना होगा। क्योंकि, अभी इस संबंध में जांच जारी है। उन्होंने यह भी कहा कि कहा कि जो लोग खुद को बच्चे का अभिभावक बता रहे हैं, उन्हें इसका प्रमाण देना होगा।

जांच के लिए बाल संरक्षण आयोग ने लिखा लेटर
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष आरती कुजूर ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर बच्चों की बिक्री किए जाने के मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। पत्र में कहा गया है कि राज्य की पंजीकृत-गैर पंजीकृत संस्थाओं द्वारा नवजात बच्चों की अवैध ढंग से बिक्री किए जाने को मानव तस्करी का अंग मानने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए मामले को गंभीरता को देखते हुए जांच हो।

अभी और भी खुलासे हो सकते हैं : सीडब्ल्यूसी
निर्मल हृदय से बच्चों की बिक्री का मामला सामने आने के बाद अब मिशनरी ऑफ चैरिटी के सभी केंद्रों की जांच हो सकती है। सीडब्ल्यूसी के अनुसार, गड़बड़ी मिलने पर अन्य केंद्रों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है। वैसे इस मामले से संबंधित दस्तावेज और सामग्री पुलिस को सौंप दी गई है। अब पुलिस जांच चल रही है। अभी और भी खुलासे हो सकते हैं।

पुलिस ने सीडब्ल्यू से लिया जांच का ब्योरा
सिटी डीएसपी राजकुमार मेहता और कोतवाली इंस्पेक्टर श्यामानंद मंडल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम शनिवार को सीडब्ल्यूसी कार्यालय पहुंची। वहां जांच का ब्योरा हासिल किया। जांच में क्या प्रगति हुई और उस पर बने प्रतिवेदनों की छायाप्रतियां लीं। उन शिकायतकर्ताओं का भी विवरण लिया, जिन्होंने पूर्व में इस संस्थान के क्रियाकलापों की सूचनाएं साझा की थीं। पुलिस उन शिकायतकर्ताओं तक भी पहुंचना चाहती है। ताकि केस से जुड़े अतिरिक्त साक्ष्य जुटाए जा सके। सिटी डीएसपी ने बताया कि सीडब्ल्यूसी के पास केस से जुड़े फैक्ट हासिल करने गए थे।

सरेंडर के बाद
मां का इंतजार 60 दिनों तक करती है सीडब्ल्यूसी
सीडब्ल्यूसी के सामने कोई भी मां अगर अपने बच्चे को सरेंडर करके चली जाती है, तो उसका 60 दिन तक इंतजार किया जाता है। अध्यक्ष रूपा कुमारी ने बताया कि इसके पीछे कारण यह है कि अगर मां की ममता जाग जाए और उसे वापस पाना चाहे, तो इस अवधि में आ सकती हैं। 60 दिन के बाद बच्चा लीगली फ्री हो जाता है। इसके बाद इसका रजिस्ट्रेशन कारा में कर दिया जाता है। उन्होंने बताया कि 99 प्रतिशत केस में नाबालिग लड़की डिलीवरी के बाद अपने बच्चे को ले जाना नहीं चाहती। जीरो से 10 साल उम्र के बच्चों को संस्थाआें में भेजा जाता है।

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