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आज के स्ट्रेस वाली लाइफ में रिलेक्स देता है म्यूजिक

3 वर्ष पहले
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मशहूर गायक पद्मश्री कैलाश खेर मंगलवार को रांची में नए रूप में रूबरू हुए। कभी संत, तो कभी आध्यात्मिक गुरु। कभी निर्गुण गायक, तो कभी संगीतज्ञ और शायर। इन सारे रंग की खासियत थी, प्रेरणा और उत्साह। ऑड्रे हाउस की शाम उनके सतरंगी अक्स लेकर श्रोता-दर्शक विदा जरूर हो गए, लेकिन बरसों तक उनकी बातें उनके जेहन में अपने रंग में रहेंगी। कला-संस्कृति विभाग की सजाई संध्या में वो करीब एक घंटा विलंब से भले पहुंचे, पर अाते ही सभी के दिल पर छा गए। वो बाेले, गीत-संगीत उनके लिए मनाेरंजन का साधन नहीं। आत्ममंथन, चिंतन और अध्यात्म तक पहुंंचने का जरिया है। संगीतकार न होता, तो पुजारी होता। पिता जी गाजियाबाद में पुजारी ही तो थे। मुझे ये तब पाखंड लगता था। डर से ईश्वर की पूजा न करें। हम बचपन से जिद्दी रहे, सो शिव मार्गी हो गए। हठी थे ही। उनका स्वरूप भोला होता है। अंदर उफान लिए होते हैं। हालांकि भोलेपन का बाजार नहीं होता। चालाकी का बाजार होता है। संगीत, कला, खेल में बच्चे की रुचि हो तो उसे अच्छा नहीं माना जाता। आज जब मुझे लोग बुलाते हैं, तो वजह पूछने पर कहते हैं, स्ट्रेस लाइफ में आप कुछ देर के लिए रिलेक्स करा देते हैं। अचानक गाने लगे, पांच बरस की मीरा लाडली हो, सखियन में खेलन जा हो......जब लोक और अध्यात्म गाता, तो खानाबदोश मलंग-संत झूमने लगते। लगा, कुछ सही कर रहा। मुझे उन संतों की जरूरत भी न थी, जो अमीरों के चहेते होते हैं।

हारिए न हिम्मत, बिसारिए न राम

कैलाश खेर बोलते ही गए। कहा, खुद लिखता हूं। खुद गाता हूं। गंगा तट छोड़ा, तो सागर तट आ गया। मां के आंचल की जगह पिता की गोद में। लेकिन आज भी मुंबई में इस तरह रहता हूं, जैसे कोई रांची से अभी-अभी गया हो। निराशा में एक बार गंगा में छलांग भी लगा दी थी। बोले, अध्यात्म ने साहस दिया। हारिए न हिम्मत, बिसारिए न राम। हर व्यक्ति के अंदर यूनिक लाइट ईश्वर ने दी है। उसे पहचानिए। मौके पर कला संस्कृति मंत्री अमर बाउरी, सचिव मनीष रंजन, निदेशक एके सिंह, सहयक निदेशक आदि उपस्थित थे।

मशहूर गायक पद्मश्री कैलाश खेर मंगलवार को रांची में नए रूप में रूबरू हुए।

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