पूजा-अर्चना के बीच शगुन देखने की रस्म, अच्छे जमाने के संकेत
नगर के पंचतीर्थ अंबिका मंदिर में बुधवार सुबह आठ बजे से दो घंटे तक चली विशेष पूजा-अर्चना व पुरातन काल से चली आ रही शगुन देखने की परम्परा के तहत ग्रामीणों ने मिट्टी के सात लोटों में जल भरकर तथा तणियां प्रथा के तहत शगुन देखे गए। इस साल अच्छा जमाना होने का संकेत मिले हैं। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी अकाल व सुकाल देखने के लिए काफी संख्या में ग्रामीणों ने मंदिर परिसर में एकत्रित होकर इस परम्परा का निर्वाहन किया। सुकाल का शगुन मिलने के साथ ही पूरा माहौल जयकारों से गूंज उठा। अक्षय तृतीया के अवसर पर पंचतीर्थ अंबिका मंदिर में शगुन लेने के लिए सुबह से ही ग्रामीणों में उत्साह नजर आ रहा था। इस धार्मिक आयोजन की तैयारियों में जूना अखाड़े के संत मनसुख हीरापुरी महाराज के सानिध्य में वृद्ध जुटे हुए थे। अभिजीत मुहूर्त में मां भवानी की विशेष आरती के बाद पूजा-अर्चना का कार्यक्रम शुरू हो गया। उसके बाद अकाल व सुकाल को लेकर यह वर्ष कैसा होगा। इसको लेकर पौराणिक परंपरा के अनुसार विभिन्न प्रकार से शगुन देखने की कशमकश में इस वर्ष सकाल होने के संकेत दिए। यह संकेत मिलने के बाद ग्रामीणों में खुशी की लहर दौड़ गई तथा ग्रामीण काफी देर तक ढोल-ढमाकों के साथ मां भवानी के जयकारे लगाते रहे। धार्मिक आयोजन की समाप्ति के बाद मंदिर पुजारी महावीर कुमार द्वारा प्रसाद वितरित किया गया।
इस तरह देखते हैं शगुन
बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि अक्षय तृतीया पर साल में अकाल व सुकाल के संकेत पाने के लिए हर वर्ष तरह-तरह के आयोजन किए जाते हैं। पुरातन काल से चली आ रही इस परंपरा का निर्वाहन करने के लिए दो तणियां (रस्सी) बांस की लकडिय़ों से बांधी जाती है। इन तणियों को बांस की लकडिय़ों के सहारे दो बच्चे अपने हाथ में लेकर खड़े हो जाते हैं। इन दोनों तणियों के बीच में साढ़े तीन फीट की लकड़ी खड़ी की जाती है। इसके बाद पूजा-अर्चना का दौर शुरू होता है। जयकारों व ढोल-नगाड़ों के बीच बच्चे के हाथ में दी हुई बांस की लकडिय़ां स्वतः ही बीच में खड़ी की हुई बांस की लकड़ी से चिपकती है। इनमें से जो भी तणी उपर की तरफ रहती है, उसको संकेत के रूप में माना जाता है। सांडेराव में सुकाल के निशान वाली तणी उपर रही, जिस पर ग्रामीणों ने सुकाल के संकेत मानते हुए खुशी प्रकट की।
इसी तरह मिट्टी के सात लोटे पवित्र जल से भरकर मिट्टी की ढेरी पर रख सात प्रकार के अनाज पूजा-अर्चन के बाद मिट्टी के लोटे में प्रवाहित कर अकाल व सुकाल देखने की परंपरा निभाई।
शगुन देखने की परम्परा के तहत ग्रामीणों ने मिट्टी के सात लोटों में जल भरकर तथा तणियां प्रथा के तहत शगुन देखे
कलाली के ठाकुरजी मंदिर में सुकाल काल की छड़ियों से मिले अच्छे संकेत
रोहट | कलाली के चौहटे में स्थित ठाकुरजी मंदिर में बुधवार शाम 5.30 से 7.30 बजे तक सुकाल व काल के शगुन लिए, जिसमें सुकाल के संकेत मिले। शाम 5.30 बजे से तणी प्रथा से शगुन लिए गए। रस्म के शुरू होने के कुछ ही देर में सुकाल की लकड़ी उपर रही। इधर, मंडली दर्जियान स्थित मंदिर में भी बुधवार को दो बालकों को अकाल व सुकाल की छड़ियों के साथ आमने-सामने खड़ा कर शगुन लिए।