नैतिकता, नागरिकता और अपराध.. उन्नाव और कठुआ की दर्दनाक घटनाएं
सुनसान स्थानों, झुग्गी झोपड़ियों और मलीन बस्तियों में बलात्कार और हत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। इन संगीन अपराधों में गरीब परिवारों बच्चियों को टारगेट किया जाता है। महानगरों में कभी-कभी विदेशी पर्यटक और कैब में यात्रा करने वाली कामकाजी महिलाएं भी बलात्कार की शिकार बन जाती हैं। ऐसी घटनाएं दिल को झकझोरने वाली तो हैं ही साथ में सरकार के पास इन्हें रोकने का एक्शन प्लान का न होना बेहद परेशान और निराश करने वाला है। नैतिकता का स्वरूप धार्मिक और पंथिक नहीं है। फिनलैंड और अन्य नोरडिक देश उत्कृष्ट नैतिकता के आधार पर ही प्रसन्नता, समृद्धि और अच्छाई में अग्रसर हैं। क्या भारत में इस प्रकार की नैतिकता के लिए नागरिकों को तैयार किया जा रहा है? अगर ऐसा हो पाता तो निर्भया, उन्नाव और कठुआ जैसी अमानवीय घटनाएं नहीं होती। उन्नाव की घटना को एक नाटकीय आवरण दिया गया है। राजनैतिक सत्ता और दलगत प्रभाव का नंगा स्वरूप सामने आया। यूपी के मुख्यमंत्री पोस्को के तहत अपराधी विधायक की गिरफ्तारी नहीं कर पाए। उन्नाव के सांसद ने विधायक के पक्ष में खड़े होकर मुख्यमंत्री का भी बचाव किया। सांसद बराबर साम्प्रदायिक कथनों के लिये जाने जाते हैं। हिन्दुत्व ही इनका एकमात्र ध्येय है। शासक दल में ऐसे अनेक नेता हैं। उनके बयानों पर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व खामोश रहता है। उन्नाव में 17 वर्ष की युवती से बलात्कार, उसके पिता की विधायक के भाई द्वारा निर्मम पिटाई और फिर जेल में मृत्यु अत्यन्त संगीन अपराध तो है ही, अपराध से बचने के अनैतिक, अवैध व कुटिल ढंग विचलित करने वाले हैं।
आरोपित विधायक की प|ी ने नाटकीय ढंग से जिला पंचायत प्रमुख के पद का दुरुपयोग करते हुये पति के बचाव में शासन को प्रभावित करने का प्रयास भी किया। जनाक्रोश, मीडिया की सकारात्मक भूमिका के कारण यह मामला दब नहीं सका। 13 अप्रैल को सीबीआई को विधायक को जेल भेजना पड़ा। इन सब प्रयासों से नागरिकता का बोध तो होता है, परन्तु नैतिकता दबी रहती है। शासन को चाहिए कि दबाव में कोई निर्दोष दंडित न हो और कोई अपराधी छूटे नहीं। इसके लिये शासन को निरन्तर नागरिकों को अपने कार्यक्रमों द्वारा यह सन्देश देना होगा कि यह सब का है, सबका सम्मान करना होगा। देश को सम्प्रदायों, स्त्री-पुरूष, गांव-शहर के मापदंडों से देखना गलत है। कठुआ में एक 8 वर्ष की अबोध बालिका की दुष्कर्म के बाद हत्या रोंगटे खड़े करने वाला है। एक गरीब परिवार की लड़की का ऐसा अंत मनुष्य के दुष्टतम आचरण का नमूना है। चूंकि लड़की एक मुस्लिम परिवार की है और अपराधी हिन्दू हैं, इसलिये इस घटना को साम्प्रदायिक रंग दिया जा रहा है। कब तक हर घटना को हम लोग साम्प्रदायिक चश्मे से देखते रहेंगे? क्या हाल होगा हमारे राजनैतिक प्रजातन्त्र का, यदि हम हर घटना मे सम्प्रदाय, पंथ, जाति, प्रदेश आदि को मापदंड बनाते रहेंगे? कठुआ में पीड़ित परिवार का जीविका का साधन पशुपालन है। छोटे बच्चे घर से बाहर पशु चराने निकलते हैं। सीमा से पार पाकिस्तानी सेना द्वारा गोलीबारी का डर तो रहता ही है, परन्तु उस बच्ची के लिए अपने की दानव बन गए। घटना अत्यन्त चौंकाने और भयभीत करने वाली है। उन्नाव और कठुआ की घटनाएं राजनीति के चक्रव्यूह में फंस कर दब नहीं जाएं, इसके लिये मीडिया और आमजन को सतर्क रहना होगा। लेखक जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रो-चांसलर और आरयू के पूर्व वीसी हैं)