दरगाह दीवान जैनुल आबेदीन बोले-जीवित रहने तक वे ही दरगाह दीवान
पारिवारिक कारण से बेटे की खिलाफत की घोषणा
अजमेर | दरगाह दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान ने कहा कि जीवित रहने तक वह स्वयं ही सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के सज्जादा नशीन एवं दरगाह दीवान हैं। उनके पुत्र नसीरुद्दीन को खिलाफत एवं उत्तराधिकारी की घोषणा केवल मात्र पारिवारिक कारणों से की गई है, जिस की घोषणा वे पिछले वर्ष भी कर चुके हैं। यह घोषणा केवल पारिवारिक विवाद के पटाक्षेप के लिए की गई है। इसमें किसी भी प्रकार की भ्रांति या गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि अपने जीवन काल में ही दीवान की नियुक्ति कर दी हो। दरगाह दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान ने मंगलवार को पत्रकार वार्ता में कहा कि आम लोगों में इस प्रकार की गलतफहमी फैलाई जा रही है कि उन्होंने अपने पुत्र को दरगाह ख्वाजा साहब में दरगाह दीवान के पद पर नियुक्त कर दिया है, जबकि यह सरासर गलत है। उन्होंने कहा कि वह स्वयं ही दरगाह ख्वाजा साहब में सज्जादानशीन और दरगाह दीवान के वंशानुगत पद पर आसीन हैं और मरते दम तक रहेंगे। इसमें किसी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ख्वाजा साहब के 806वें उर्स के मौके पर खानकाह में आयोजित होने वाली पारंपरिक महफिल में उन्होंने अपने पुत्र सय्यद नसरुद्दीन चिश्ती को केवल अपना खलीफा उत्तराधिकारी बनाया था, जो चिश्तिया सूफी रिवायत की एक स्थापित परंपरा है।
उत्तराधिकारी नियुक्त करना भारतीय कानून के अनुसार मौलिक अधिकार है, जो उत्तराधिकार घोषणा करने वाले के मरणोपरांत प्रभावी होता है।
आबेदीन ने कहा कि इसको इस रुप में नहीं देखना चाहिए कि उन्होंने अपने जीवन काल में ही अपने पुत्र को दीवान नियुक्त कर दिया हो। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि मौजूदा दरगाह दीवान के निधन के बाद दीवान या सज्जादानशीन पद की एक स्पष्ट प्रक्रिया है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि दरगाह ख्वाजा साहब में होने वाली रस्में दरगाह दीवान की नहीं अपितु ख्वाजा साहब की हैं। विगत दिनों कुछ गलतफहमी के कारण उनमें जो व्यवधान आया है उसके लिए उन्हें बेहद दुख है, किसी भी गलतफहमी का शिकार होकर ख्वाजा साहब की रस्मों में व्यवधान उत्पन्न होना चिश्तिया सूफी परंपरा को आघात पहुंचाना है। दरगाह ख्वाजा साहब में परंपराओं का निर्वहन चिश्तिया सूफी मत एवं सिद्धांतों के मुताबिक होना अनिवार्य है।