अब टेक्नोलॉजी की लत को दूर करने में लगी सिलिकॉन वैली
हर दिन प्रत्येक 19 मिनट में औसतन 47 बार अमेरिकी फोन चैक करते हैं। स्मार्टफोन की स्क्रीन को छूने की इतनी आदत हो चुकी है कि हर दिन हम पांच घंटे तक अमूमन इस पर निकाल देते हैं। इसी आदत को छुड़ाने के लिए सिलिकॉन वैली में कुछ कंपनियां इस पर काम कर रही हैं, क्योंकि इससे बच्चे, किशोर और वयस्क मानसिक बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। ये लत की तरह हो चुका है।
अमेरिका सायकोलॉजिकल एसोसिएशन के मुताबिक 65 फीसदी का मानना है कि इस लत को छोड़ा तो मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में पिछले वर्ष हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि स्मार्टफोन को मात्र सामने रखभर देने से व्यक्ति की संज्ञान की क्षमता गड़बड़ा जाती है। वह बुनियादी मुद्दों से हट जाता है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के सायकोलॉजिस्ट एडम अल्टर कहते हैं कि वर्तमान में जो दौर टेक्नोलॉजी से जुड़े रहने का है, वह महामारी का रूप ले चुका है। आलोचक इससे सहमत हैं। किसी एप से हम लंबे समय तक चिपके हुए हैं, तो इसका अर्थ है कि इस एप के बनाने वालों को हम अपने पर्सनल डेटा को बेच रहे हैं। ये हमारा ज्यादा ध्यान खींच रहा है। इस तरह से हम गूगल या फेसबुक के कस्टमर नहीं रहते, वरन हम उनके लिए प्रोडक्ट बन चुके हैं और हमें उनके हाथों बेचा जा रहा है।
रिसर्च के लिए इन दिनों एक बिल्कुल नया क्षेत्र है ‘परसुएसिव टेक्नोलॉजी’। इसमें ये देखा जाता है कि किस तरह से कंप्यूटर मनुष्य के विचारों और गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। न्यूरोसाइंस और बिहेवियरल सायकोलॉजी के लिए भी ये गहन विषय है। हजारों एप, इंटरफेस और डिवाइस कैसे कई लोगों को लगातार स्क्रॉलिंग करने को प्रोत्साहित करते रहते हैं। दूसरी ओर ये कुछ लोगों को इसके लिए हतोत्साहित भी करते हैं।
कंप्यूटर कैसे मनुष्य के बर्ताव को काबू में कर लेते हैं इस पर सबसे पहले अध्ययन करने वाले स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बीजी फॉग कहते हैं कि यदि 20 वर्ष पहले मैंने यह घोषणा की होती कि हम ऐसी मशीनें बना रहे हैं, जो मनुष्य को नियंत्रित करने वाली हैं, तो हल्ला मच गया होता। लेकिन आज हम ‘परसुएसिव टेक्नोलॉजी’ के बीच हैं।
हर कंज्यूमर टेक कंपनी एमेजॉन जैसी कंपनियों के जरिए काम कर रही है। कंपनियां चाहती हैं कि लोग उनके प्लेटफॉर्म पर अधिक समय तक बने रहे। फेसबुक के डिजाइनर ये तय करते हैं कि कौनसा वीडियो या फ्रेंड्स कमेंट आपको ऊपर दिखेगी। गूगल के एक पूर्व कर्मचारी ट्रिस्टन हैरिस और फेसबुक के इन्वेस्टर रॉजर मॅकनेमी ने तो बाकायदा टेक कंपनियों पर आरोप लगाया कि वे जानबूझकर ऐसे प्रोडक्ट दे रही हैं, जिससे लोगों की लत बन जाए। एपल के शेयरहोल्डर ने सार्वजनिक रूप से कंपनी से कहा कि वह टेक्नोलॉजी की लत को कम करने वाले आई फोन बनाएं।
पिंटरेस्ट सिलिकॉन वैली की पहली कंपनी थी, जिसने बिहेवियरल सायकोलॉजिस्ट को नौकरी दी और वह चाहती थी कि उसके फोटो एलबम में आधी ही फोटो दिखे, जिससे देखने वाले की जिज्ञासा बनी रहे। वह कभी शांत न हो और कंज्यूमर उसके प्लेटफॉर्म पर बना रहे।
टेक डिटॉक्स करने के लिए काम शुरू हो चुका है। सेनफ्रांसिस्को में टेक्नोलॉजी माइंडफुलनेस नाम से एक कांफ्रेंस हुई। इसमें टेक फ्री प्राइवेट स्कूल, टेक फ्री मीटिंग जैसे विचारों पर मंथन किया गया। कुछ एप जैसे ‘मोमेंट’ और ‘ऑनवर्ड’ को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि वे लोगों में फोन की लत को सीमित कर दें।