हाईकोर्ट में बैकडोर भर्ती को चुनौती देने वाली पीआईएल खारिज
हाईकोर्ट ने बिना भर्ती विज्ञापन के साल 2009 में बैक डोर के जरिए कोर्ट में हुई कर्मचारियों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली एडवोकेट प्रमोद नारायण माथुर व गोपाल केशावट की पीआईएल शुक्रवार को खारिज कर दी। वहीं अदालत ने एक अन्य त्रिलोक सैनी की याचिका पर अंतिम सुनवाई एक मई को तय की है। न्यायाधीश एम.एन.भंडारी व डीसी सोमानी की खंडपीठ ने यह निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान अप्रार्थी कर्मचारियों की ओर से कहा कि सेवा संबंधी मामलों में पीआईएल मेंटेनेबल नहीं है, इसलिए इन्हें खारिज किया जाए। जिस पर अदालत ने दोनों पीआईएल को खारिज कर एक अन्य याचिका पर अंतिम सुनवाई तय की।
याचिका में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट व अधीनस्थ कोर्ट में स्टाफ की भर्ती करते समय नियमों का पालन और कोई भी भर्ती नियमों के विरुद्ध नहीं होने का निर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2014 में रेनू व अन्य की अपील का निपटारा करते हुए कहा था कि हाईकोर्ट व अधीनस्थ कोर्ट में यदि कोई नियुक्ति नियमों के विपरीत हो तो वह अवैध मानी जाए, चाहे वह किसी भी पद या किसी व्यक्ति से संबंधित क्यों न हो। लेकिन 2009 में राजस्थान हाईकोर्ट में बिना भर्ती विज्ञापन के कई लोगों को कनिष्ठ न्यायिक सहायक के पद पर पहले तदर्थ नियुक्ति दी और बाद में उन्हें नियमित कर दिया। जिन्हें नियुक्ति दी वे हाईकोर्ट में कार्यरत व रिटायर अफसरों व कर्मचारियों के रिश्तेदार हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार ये नियुक्तियां अवैध हैं व इन्हें निरस्त करें। हाईकोर्ट ने 19 साल पहले खारिज की थी 104 अस्थाई लिपिकों की याचिकाएं: हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने अप्रैल 1999 के आदेश से हाईकोर्ट में अस्थाई रूप से नियुक्त 104 लिपिकों का सेवाकाल बढ़ाने से इंकार करते हुए उनकी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। अदालत ने ललिता बोहरा के मामले में कहा था कि निश्चित समयावधि के लिए अस्थाई आधार पर नियुक्त किए गए व्यक्ति को कोई ऐसा अधिकार नहीं है कि वह तय समय पूरा होने के बाद सेवा में निरंतर नियुक्त रहे।
एक अन्य याचिका पर अंतिम सुनवाई 1 मई को