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मानवीय कर्म का धर्म है उसकी पूर्णता

3 वर्ष पहले
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धर्म की अपने-अपने हिसाब से इतनी परिभाषाएं दे दी गईं हैं कि धर्म होता क्या है, यह भी एक बहुत बड़ा भ्रम बन गया है। हर वस्तु का अपना एक स्वभाव, एक रूप-रंग होता है और वही उसका धर्म है। अग्नि जलाती है, उसमें ऊष्मा है, यह उसका धर्म है। पानी की शीतलता उसका धर्म है। वायु का वेग वायु का धर्म है। इसी तरह इंसानियत इंसान का धर्म है। शास्त्रों में तो लिखा है कि अपने धर्म से हटने के बाद आप पशु रह जाते हैं। तो मनुष्य की विशेषता इसमें है कि वह अपने धर्म को समझे और उसेे निभाए। हम मनुष्य हैं तो कर्म जरूर करेंगे। कर्म पशु भी करते हैं लेकिन, पशु का अधिकांश कर्म अकारण और दूसरों से आदेशित होता है। किंतु मनुष्य कर्म करते समय अपने धर्म को याद रखे। पूर्णता ही कृत्य का धर्म बनता है। आजकल जब हम किसी संस्थान अथवा किसी व्यवस्था में कुछ काम करने निकलते हैं तो किसी को कोई काम बताओ तो कहता हैै- हां, मैंने सामने वाले को कह दिया हैै। एक बात ध्यान रखिए, आज के समय में ‘कह दिया’ को ‘हो गया’ न मान लें। किसी भी कर्म के पीछे तीन चरण हैं- कहा, किया और हुआ। ‘होने’ पर ही उसका धर्म पूरा होगा। यह वास्तव में कर्म का धर्म है। हमने किसी को कहा और मान लेते हैं ‘हो गया’। यह बहुत बड़ी भूल है। ऐसे ही सामने वाले ने कर दिया और सोचा ‘हो गया’, यह उससे भी बड़ी भूल हैं। कर्म का धर्म पूर्णता है। धर्म को समझे बिना चाहे कर्म करें, चाहे जीवन जीएं, आप गलत रास्ते पर ही होंगे।



पं. िवजयशंकर मेहता

humarehanuman@gmail.com

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