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दीक्षा : मुमुक्षु सुरभि बन गईं स्वागत श्रीजी

3 वर्ष पहले
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नगर में गुरुवार को 28 सालों बाद एक एेतिहासिक आयोजन हुआ। यहां 109 संतों की उपस्थिति में आचार्य रामलालजी ने मुमुक्षु सुरभि को दीक्षा दी। इसके बाद वे साध्वी स्वागत श्रीजी बन गईं। आयोजन सुबह सूर्योदय के तुरंत बाद हुआ। आचार्यश्री के प्रवचन भी हुए। इसके बाद 108 तपस्वियों के पारणा किए गए। कार्यक्रम देशभर से आए श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति में हुआ। इस दौरान एक अन्य मुमुक्षु को भी दीक्षा के लिए आज्ञापत्र मिला। उनकी दीक्षा 8 अगस्त को रतलाम में होगी।

कालाखेत मैदान पर बने विशाल पंडाल में बुधवार सुबह 5 बजे से ही लोगों का आना शुरू हो गया था। सुबह 6.5 बजे दीक्षार्थी सुरभि संघवी दीक्षा स्थल पर पहुंचीं। यहां 6.45 बजे से 7.15 बजे तक आचार्य रामलालजी ने दीक्षा कराई। इसके बाद सुरभि संघवी के केशलोच हुए। आचार्यश्री ने उन्हें साध्वी स्वागत श्रीजी नाम दिया। कार्यक्रम साधु मार्गीय जैन संघ ने किया।

धर्मस्थल पर हुई सभा में आचार्यश्री ने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय हमारी चेतना पर लगे हुए हैं। हमें कोशिश करना चाहिए कि हम स्वयं को देख सकें, इसे ही साधना कहते हैं। भगवान महावीर ने भी कहा है कि दूसरों को नहीं स्वयं को देखें । आज के परिप्रेक्ष्य में चिंतन करना है कि सत्य और ईमान कहां जा रहे हैं। हमारे जीवन में उनसे इतनी दूरियां बढ़ चुकी हैं। उन्होंने कहा कि आज पैसे के पीछे आदमी पागल हो रहा है। आत्महत्या की भी सोचने लगता है। पाप हमारी आत्मा को नीचे ले जाता है, आत्मा को भारी करता है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम इस जीवन को निर्णायक बना लें, धन की दौड़ में हम कोई ऐसे-वैसे काम ना करें। जैन धर्म अहिंसा की स्थिति में जीने वाला धर्म है। भावुकता और आतुरता में हमें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे हमारे समाज, राष्ट्र, परिवार पर कोई लांछन लगे।

दीक्षा से पहले सुरभि

दीक्षा के बाद मुमुक्षु

8 अगस्त 2018 को रतलाम में होगी दीक्षा

आचार्य रामलालजी ने मुमुक्षु पूजा पिता सुरेंद्रकुमार डागा को भी दीक्षा-पत्र दिया। उनकी दीक्षा 8 अगस्त 2018 को रतलाम में होगी। पूजा गंगाशहर राजस्थान की रहने वाली हैं। नगर में ही इससे पहले करीब 28 साल पहले उदयपुर निवासी विवेकमुनि की भी दीक्षा हुई थी।

रस पीकर किया पारणा

दीक्षा के आयोजन के बाद सुबह10.30 बजे वर्षीतप के तपस्वियों के पारणे हुए। देशभर से 108 से अधिक वर्षीतप के तपस्वियों ने भाग लिया। इन्होंने गन्ने का रस पीकर पारणा किया।

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