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चिंता की बात नहीं, प्लास्टर गिरा है, डाट की पुल का नया वाला हिस्सा ट्रेनों के लिए मजबूत है

3 वर्ष पहले
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छत के बड़े हिस्से का प्लास्टर गिरने के बाद वाहन चालक डरकर गुजरते रहे।

बुधवार सुबह छत का प्लास्टर गिरने से रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग ने की जांच

भास्कर संवाददाता | रतलाम

डाट की पुल का नया वाला हिस्सा ट्रेनों की आवाजाही के लिए अभी भी मजबूत है। बुधवार सुबह पुल की छत का प्लास्टर गिर गया था। करीब एक-बाय तीन मीटर के हिस्से का प्लास्टर गिर जाने के बाद पुल को लेकर कयास लगाए जा रहे थे। रेलवे इंजीनियरों ने पुलिया की जांच की और वे इसकी मजबूती को लेकर संतुष्ट है। उनके अनुसार सिर्फ छत का प्लास्टर गिरा है, जिसे रात को रिपेयर कर ठीक कर दिया जाएगा। बुधवार दिनभर सामान्य तौर पर ट्रेनें पुल से गुजरती रही। आखिरी बार कब रखरखाव हुआ था, इसका रिकॉर्ड नहीं है लेकिन पीआरओ जेके जयंत के मुताबिक रेलवे समय-समय पर रंग-रोगन और अन्य जरूरी मेंटेनेंस करती है। यातायात की आवाजाही में दिक्कत है तो पुल को चौड़ा करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। वह रेलवे को राशि उपलब्ध कराती है, तो इसे चौड़ा किया जाएगा।

आधा हिस्से का 1899 में हुआ था निर्माण

पुल का पुराना वाला हिस्सा डाट दार पुल क्रमांक 288 का निर्माण 1899 में मंडल रेल प्रबंधक के बंगले के लगभग साथ ही हुआ था। तब से बंगला और पुल दोनों खड़े हैं। डाट दार पद्धति पर बना पुल कुछ दशक पहले बनाए पुलों से ज्यादा मजबूत है। अभी भी इस पर से रोजाना 150 से ज्यादा पैसेंजर व गुड्स ट्रेनें गुजरती हैं। रेलवे को इसका ज्यादा मेंटेनेंस भी नहीं करना होता है।

कहां से आई डाट दार निर्माण कला

भारत के प्राचीनकाल के निवासी, नदी तट की चट्टानों को आगे बढ़ाकर शिलाखंड रखते हुए और आखिरी के अंतराल को एक ही खंड से पाटकर, बनाया करते थे। पुरातत्ववेत्ताओं के मत से दजला-फरात की उर्वर घाटी (मेसोपोटामिया ) में 4000 वर्ष ईसा पूर्व सुमेर बस्ती बसी थी। तब ईट एकमात्र निर्माण सामग्री और प्रमुख निर्माण सिद्धांत डाट या गुंबद का था। संभवत: इसी दौरान ईंटों को घुमाकर जमाते हुए डाट दार पुलों की निर्माणकला का जन्म हुआ। इस प्रकार वास्तविक डाट की खोज हुई।

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