भाषा ही स्वयं की नहीं होगी तो राष्ट्र हमारा कैसे हो पाएगा : डॉ. परिहार
जिस राष्ट्र की धरा पर हमने जन्म लिया, उस राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा तभी संभव है जब स्वयं की भाषाएं सुरक्षित हो, आयातित भाषाओं से राष्ट्र व स्वयं की अस्मिता शून्य होगी। यदि भाषा ही स्वयं की नहीं होगी तो यह राष्ट्र हमारा कैसे होगा। जिन नदियों के स्रोत सजल नहीं होते, वे वर्षा ऋतु के बाद सूख जाती है। उसी तरह जिस संस्कृति की अपनी भाषाएं नहीं होंगी, वह संस्कृति भी सूख जाएगी।
यह बात साहित्य परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. रामपरिहार ने प्रख्यात शिक्षाविद् स्व. भंवरलाल भाटी की स्मृति में आयोजित व्याख्यानमाला के दूसरे दिन रंगोली सभागृह में कही। यहां “राष्ट्रीय अस्मिता एवं भारतीय भाषाएं” विषय पर व्याख्यान हुए। डॉ. परिहार ने कहा हमारी सभी ललित कलाएं, हमारे सभी संदर्भ, हमारे लोक नृत्य, हमारे पर्व, हमारे लोक व्यवहार सब कुछ हमारी अपनी भाषाओं में ही तो हैं तो फिर किसी विदेशी भाषा से हम इन सभी को कैसे समझ सकते हैं। हमारा स्वतंत्रता आंदोलन कौनसी भाषाओं में हुआ, वेदांत का दर्शन स्वामी विवेकानंद ने विश्व को कौनसी भाषा में प्रदान किया। भूगोल संस्कृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, हम गर्म देश के लोग हैं, हमारे यहां 6 ऋतुएं होती हैं, इस प्रकृति को हम अपनी भाषाओं में ही महसूस कर सकते हैं। यह सांस्कृतिक बोध ही हमारी अस्मिता की रक्षा करता है। कई भाषाओं को सीखना आपत्तिजनक नहीं है लेकिन हम अपनी संस्कृति से अपनी ही भाषा के माध्यम से जुड़ पाएंगे किसी अन्य भाषा से नहीं। यदि भाषा ही स्वयं की नहीं होगी तो यह राष्ट्र अपना कैसे होगा। इसलिए स्वयं को बचाने के लिए व राष्ट्र को बचाने के लिए भाषाओं को बचाना होगा। व्याख्यानमाला की अध्यक्षता करते हुए समाजसेवी गुस्ताद अंकलेसरिया ने भी भारतीय भाषाओं के भारत के विकास में योगदान का उल्लेख किया। समिति के अध्यक्ष डॉ. देवकीनंदन पचौरी ने भारतीय भाषाओं को उचित स्थान नहीं मिलने के ऐतिहासिक कारण बताते हुए कहा राज सत्ताओं से भाषाओं का उत्थान संभव नहीं। कार्यक्रम की शुरुआत में अतिथियों ने भारत माता व डॉ. भीमराव आंबेडकर के चित्र पर माल्यार्पण किया। संचालन मालवी बोली में संतोष निनामा ने किया।
कार्यक्रम मे उपस्थित लोग। इनसेट : दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए अतिथि।