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‘साधक को व्यवहार में सदा साधुता रखनी चाहिए’

3 वर्ष पहले
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रतलाम | साधक को व्यवहार में सदा साधुता रखनी चाहिए। दुख को शांतिपूर्वक सहना, क्रोध के बदले क्षमा, बैर के बदले प्रेम, श्राप के बदले वरदान, बुरा करने वाले के साथ भलाई, अपने गुण या बड़प्पन का अभियान नहीं होना चाहिए। अपने को सदा छोटा समझना आवश्यक हो। थोड़ा और सदा हित-मित वचन ही बोलना चाहिए। यह बात पोरवाड़ों का वास स्थित आराधना भवन में साध्वी दिव्यप्रज्ञाजी ने कही। उन्होंने कहा बड़ों से विनय और छोटों से प्रेम व्यवहार होना, सदा संतुष्ट रहना, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान से सदा दूर रहना और अपनी प्रशंसा सुनने में उदासीन रहना चाहिए। दीन व दुखी पर दया रखते हुए उन्हें सुख पहुंचे ऐसा प्रयास करना चाहिए। दूसरों के धर्म व धर्म क्रियाओं की निंदा नहीं करना चाहिए। मन में बुरे व अपवित्र विचार न आएं, सदा अच्छे विचार आएं ऐसा प्रयास करना चाहिए।

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