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झाबुआ, मंदसौर, थांदला के साथ राजस्थान से रक्त चढ़वाने रतलाम आ रहे थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे, दिव्यांगता के प्रमाण-पत्र मिलना शुरू, अस्पताल में रहेगा एक अलग कमरा

3 वर्ष पहले
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थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए मानव सेवा समिति ब्लड बैंक में लगी ब्लड सेपरेशन मशीन वरदान साबित हा़े रही है। झाबुआ, मंदसौर, थांदला सहित राजस्थान के शहरों से भी पीड़ित बच्चे रक्त चढ़वाने रतलाम आ रहे हैं क्योंकि आसपास के जिलों में यह मशीन नहीं है। थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए अब जिले में विकलांगता प्रमाण-पत्र बनना भी शुरू हो गए हैं। अब इन बच्चों के लिए जिला अस्पताल में जल्द ही एक अलग कमरे की व्यवस्था की जाएगी।

थैलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला रक्त रोग है। इसका असर लीवर, किडनी, हार्ट पर पड़ता है। इससे ये काम करना बंद कर देते हैं और मरीज की मौत हो जाती है। इस बीमारी को सरकार ने गंभीर रोगों की श्रेणी में रखा है लेकिन शहर में अन्य शहरों के मुकाबले थैलेसीमिया के बच्चों को बेहतर सुविधा दी जा रही है। शहर के अलावा झाबुआ, मंदसौर, थांदला, नागदा जं., राजस्थान के कुशलगढ़ आदि शहरों से बच्चे रतलाम आकर इलाज करवा रहे हैं। इसका कारण है मानव सेवा समिति में लगी ब्लड सेपरेशन मशीन। यहां हर महीने एक बच्चे को 2 बार रक्त चढ़ाया जाता है। थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को रेड ब्लड सेल ही जरूरी होते हैं। रतलाम में बच्चों का इलाज पूरी तरह नि:शुल्क किया जा रहा है।

थैलेसीमिया पीड़ित वर्षा को मिला पहला दिव्यांगता प्रमाण-पत्र

थैलेसीमिया को अब सरकार ने भी दिव्यांगता की श्रेणी में लिया है। इससे पीड़ित मरीजों को दिव्यांगता के प्रमाणपत्र बनाए जा रहे हैं। जिले में इसकी शुरुआत हो गई है। पहला प्रमाणपत्र थैलेसीमिया पीड़ित वर्षा पंवार को दिया है। समाजसेवी गोविंद काकानी ने बताया अभी एक ही प्रमाण पत्र दिया है अन्य बच्चों के लिए भी जल्द प्रमाणपत्र बनाए जा रहे हैं। रतलाम के अलावा अन्य शहरों से आने वाले बच्चों को परेशानी ना हो इसलिए काकानी सोशल वेलफेयर प्रमाण पत्र बनवाएगा। इसके लिए जरूरी दस्तावेज व जानकारी के साथ डॉक्टर द्वारा प्रमाणित थैलेसीमिया की रिपोर्ट भी होना चाहिए।

आईसीयू या सामान्य वार्ड में नहीं चढ़वाना होगा रक्त

थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए अब जिला अस्पताल में भी अलग से कमरा बनाया जाएगा ताकि बच्चों को रक्त चढ़ाने में परेशानी ना हो। अभी तक ब्लड चढ़ाने के लिए हाईजीनिक रूम की व्यवस्था नहीं होने से आईसीयू में ही पीड़ित बच्चों को ब्लड चढ़ाया जाता रहा है। ऐसे में मरीजों में संक्रमण की आशंका रहती है। जिले में थैलेसीमिया पीड़ितों की संख्या 60 है। इन्हें हर महीने एक से दो बार ब्लड चढ़वाने आना पड़ता है।

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