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कर्त्तव्यों के पालन से ही हमारी आत्मा का कल्याण होता है

3 वर्ष पहले
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संसार के सभी व्यावहारिक कर्त्तव्य को हम जानते हैं, स्वीकार कर उसका पालन भी करते हैं। उसी प्रकार धर्म भी हमारा परम कर्त्तव्य है। उसमें भी भिन्न-भिन्न कर्त्तव्य बताए गए है। जिनके पालन के द्वारा हमारी आत्मा का कल्याण होता है।

यह बात साध्वी दिव्य प्रज्ञाश्रीजी ने शहर सराय स्थित पटवा निवास पर कही। उन्होंने कहा संघ की पूजा-बहुमान करना, साधार्मिक की भक्ति करना, तीर्थ यात्रा, महापूजा श्रुतज्ञान की भक्ति, शासन प्रभावना वगैरह श्रावकों के लिए ग्यारह कर्तव्य बताए है। यह वर्ष में एक बार अवश्य करना चाहिए। संसार सागर से तिराए उसे तीर्थ कहते हैं। तीर्थ की यात्रा करते हुए संसार सागर में डूब रही हमारी आत्मा संसार सागर से तिर जाती है। तीर्थ यात्रा करें। तीर्थ क्षेत्र में आशातना हो ऐसा बर्ताव हमें नहीं करना चाहिए। तीर्थ यात्रा में जाते हुए रात्रि भोजन करना, मौज-मस्ती करना यह सभी तीर्थ की आशातना है। उनसे हमें अवश्य बचना चाहिए। प्रभु की प्रतिमा जितनी पूजनीय है। उतनी प्रभु की वाणी के रूप में शास्त्र ग्रंथ भी पूजनीय है। शास्त्र ग्रंथों की पूजा, बहुमान, भक्ति करना भी हमारा परम कर्त्तव्य है।

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