पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Local
  • Mp
  • Ratlam
  • चातुर्मास का प्रोटोकॉल : धर्म आराधना का शिष्ट आचरण न त्यागें

चातुर्मास का प्रोटोकॉल : धर्म आराधना का शिष्ट आचरण न त्यागें

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
तीर्थंकर परमात्मा ने शिष्टाचार को महत्व दिया है। उन्होंने शिष्टाचार का पालन प्रत्येक परिस्थिति और स्थिति में करते हुए समाज को प्रेरणा दी है क्योंकि जिसका आचरण शिष्ट होगा वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करेगा। हम भी शिष्टाचार को बढ़ाते हुए चातुर्मास में अधिकाधिक धर्म से पुण्यार्जन कर जिन शासन की शोभा बढ़ाएं। चातुर्मास का प्रोटोकॉल यही कहता है कि धर्म आराधना का शिष्ट आचरण कभी न त्यागे।

यह बात जिनचंद्रसागर सूरिजी मसा व हेमचंद्रसागरजी मसा ‘‘बंधु बेलड़ी’’ ने कही। वे चातुर्मास स्थल आगमोद्धारक वाटिका श्री पंचान ओसवाल साजना साथ हवेली में श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्री संघ द्वारा आयोजित व्याख्यान के 17वें दिन भगवती सूत्र और शत्रुंजय महात्म्य गाथा का श्रवण करवा रहे थे।

धर्म के क्षेत्र में हमारी जिज्ञासा प्रबल होना चाहिए

हेमचंद्रसागरजी मसा ने कहा किसी भी कार्य की शुरुआत में मांगलिक का विधान है। इससे कार्य की सफलता में संदेह नहीं रहता है। तीर्थंकर परमात्मा ने भी मांगलिक का महत्व बताया है। इसका आश्रय लेने से नई प्रेरणा और स्फूर्ति मिलती है। उन्होंने कहा धर्म के क्षेत्र में हमारी जिज्ञासा प्रबल होना चाहिए। इसके बगैर नित्य आगे बढने का उत्साह नहीं बनता। अपनी जिज्ञासाओं को गुरुदेव के समक्ष रखने से उसका न केवल निदान बल्कि समाधान भी मिलता है। उन्होंने कहा नवकार महामंत्र परमात्मा का प्रतिनिधि है इसकी आराधना परमात्मा की ही आराधना है। नवकार का आधार भव से पार कर देता है। उन्होंने जल्द ही शुरू होने जा रही नवकार आराधना के बारे में भी बताया।

‘विश्वास के संकट को विश्वसनीयता से दूर कर सकते हंै’

गणि विरागचंद्र सागरजी मसा ने कहा आज समाज में विश्वास का सबसे बड़ा संकट है। पहले दुकानों पर ग्राहक के स्वागत में लिखा होता था ग्राहक हमारा देवता है और आज लिखा होता है आप सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में है। यह स्थिति सामाजिक जीवन और संबंधों में चिंताजनक है। विश्वास के संकट को विश्वसनीयता के माध्यम से दूर किया जा सकता है। इच्छाओं का छोर नहीं होता है। उन्होंने बताया बचपन में विनय और वात्सल्य, यौवन में विवेक और विश्वास जबकि वृद्धा अवस्था में वैराग्य होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा भक्ति में खोने वाला ही सत्य को खोज पाता है। शत्रुंजय महात्म्य गाथा का श्रवण करते हुए उसी में तल्लीन हो जाना है। यह तीर्थ एक ऐसा रन-वे है जहां से सिद्धशिला का जहाज उड़ान भरता है। भक्तों के लिए यह ऊर्जा का स्त्रोत है, इसके महात्म्य को सुनने मात्र से पुण्यार्जन होता है।

खबरें और भी हैं...