डॉ. आंबेडकर ने हिंदुओं का नहीं कुरीतियों का विरोध किया था
जीवन के झंझावातों से टूट जाए वो मानव होता है और जो संघर्ष कर सफलता प्राप्त करे, वो महामानव होता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ऐसे ही महामानव थे। भारत में महान् व्यक्तित्वों का जन्म हुआ है, जिन्होंने अपने जीवनकाल में व मरने के बाद भी अपने कालजयी विचारों से देश व समाज को दिशा दी। 5 वर्ष की आयु में जन्मदात्री माता का साया सिर से उठ जाने के बाद भी पुण्यभूमि भारत को अपनी मां मानकर संपूर्ण जीवन भारत माता व उनकी संतानों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। बाबा साहेब ने सदैव हिंदू समाज की जातिगत और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया नाकि हिंदू समाज के खिलाफ।
यह बात प्रख्यात चिंतक व शिक्षाविद स्व. भंवरलाल भाटी की स्मृति में दो दिवसीय व्याख्यानमाला के तहत रंगोली सभागृह में “सामाजिक समरसता में डॉ. भीमराव आंबेडकर का योगदान” विषय पर इतिहासकार डॉ. सुब्रतो गुहा ने कही। अध्यक्षता करते हुए समाजसेवी व भील समाज अध्यक्ष राजेंद्र बारिया ने समाज को तोड़ने और देश के विखंडित करने का सपना देखने वाले संगठनों की आलोचना की। स्व. भाटी स्मृति व्याख्यानमाला समिति अध्यक्ष शिक्षाविद डॉ. देवकीनंदन पचौरी ने भेदभाव के खिलाफ संघर्ष कैसे किया जाता है, इसकी सीख डॉ आंबेडकर से लेने का आग्रह किया। संचालन संतोष निनामा ने किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ता व उपस्थित लोग।