2 का पहाड़ा फिर सुनने पहुंचे बचपन की गलियों में
दो एकम दो...दो दुनी चार...ये पहाड़ा यूं तो बिल्कुल आम है लेकिन रविवार को हुई एलुमिनाई मीट में इसे अलग अंदाज से पेश किया गया। एलुमनी रवींद्र ने जब दो के पहाड़े को सुरीली ढंग से पेश किया। सभागार में मौजूद सभी एलुमिनाई फिर से बच्चे बन पहाड़ा सुनाने लगे। वैश्य टेक्निकल इंस्टीट्यूट में रविवार को पहली एलुमिनाई मीट का आयोजन किया गया। इसमें साल 1965 से लेकर 2017 तक के पूर्व विद्यार्थियों ने भाग लिया। हर बैच के स्टूडेंट्स ने मंच पर आ, अपने अनुभव साझा किए। 1979 के जंबो बैच के मंच पर आते ही हॉल तालियों से गूंज उठा। ये था हमारी क्लास का टॉपर, जिसने न जाने कितने बच्चों को फ़र्स्ट डिविजन से पास कराया। और इसे देखो ये जो अभी पीछे छिप रहा है ये क्लासेज बंक कर गर्ल्स कॉलेज के सामने पेड़ों पर चढ़ा मिलता था। पिक्चर के लिए टिकट लेने के लिए इसे उठा लेते थे। एक के बाद एक एलुमिनाई ने अपने और दोस्तों की शरारतों की पोल खोली।
रात में गुम हो दोस्तों को डराते थे
वीटीआई के सबसे पहले बैच 1956 के विद्यार्थी बीके मित्तल ने बताया कि कॉलेज के दिनों की यादें आज भी दिल में ताजा है। उन्होंने बताया कि पीजी में चार दोस्तों के साथ रहते थे। जब भी किसी दोस्त को सताने का मन करता तो रात को बिना बताए चला जाता। दोस्त सारी रात ढूंढते रहते थे। पिक्चर का भी शौक कॉलेज के दिनों में ही परवान चढ़ा था। जब भी कोई फिल्म लगती, मैं क्लासेज छोड़ दोस्तों के साथ पहला शो देखने भाग जाता।
रोहतक . कार्यक्रम के दौरान डांस करते पूर्व छात्र।
जंगलों से खच्चर पकड़ ले गए थे प्रिंसिपल ऑफिस, चाचा से पड़ी थी लताड़
बैच 1965 के विद्यार्थी शिव चरणदास गुप्ता ने बताया कि पचास साल बाद वापस आने की खुशी बयान नहीं की जा सकती। कॉलेज के दिनों को याद कर हंसते हुए उन्होंने बताया कि एकबार नारे लगाते हुए उन्हें प्रिसिंपल ऑफिस जाना था। कॉलेज के आसपास जंगल होने की वजह से वहां हमें खच्चर मिल गया। मैंने खच्चर को साथ ले प्रिंसिपल ऑफिस के सामने खड़ा कर दिया। उस समय मेरे चाचा सोसायटी में मेंबर थे। प्रिंसिपल ने उन्हें बुला मेरी हरकत बताई। फिर तो जो डांट पड़ी वो आज तक याद आती है।
कॉलेज के पहले दिन सीनियर्स ने की थी रैगिंग, बाद में बने जिंदगी भर के लिए दोस्त
रोल नं 92/81 रामनिवास निगाना ने शायराना अंदाज में अपने कॉलेज के दिनों को दोहराया। 1981 बैच के विद्यार्थी ने याद आता है मुझे कॉलेज का वो जमाना...जब पजामा और शर्ट पहन होता था आना.. सुना अपनी यादें बताई। उन्होंने बताया कि उस समय गांव के परिवेश से निकले ही थे। कॉलेज के पहले दिन के बारे में बताते हुए उन्होंने बताया कि पहला दिन बेहद डराने वाला रहा। मेस से खाना खाकर जैसे ही बाहर निकले सीनियर्स ने इंट्रोडक्शन राउंड के लिए बाहर घेर लिया। उस दिन लगा कि आज बुरे फंसे। लेकिन बाद में वो सीनियर्स कम बेहतर दोस्त बन उभरे।
जंबो बैच के नाम से जाते थे जाने, स्टूडेंट्स के हक के लिए किया काम
साल 1979 बैच के स्टूडेंट अशोक जैन ने बताया कि उनके बैच को जंबो बैच के नाम से जाना जाता था। सबसे ज्यादा संख्या वाला बैच हमारा हुआ करता था। उस समय हमने स्टूडेंट्स के हक में एक एसोसिएशन बनाई थी। उस समय 16 पेपर हुआ करते थे जो हमने बाद में विरोध कर 14 करवाए। उन्होंने बताया कि हॉस्टल में रात को भूत बनकर दोस्तों को डराया करते थे। जब भी फिल्म देखने का मन करता तो क्लास के सबसे लंबे लड़के को आगे कर देते। वो पल जिंदगी के खास लम्हों में कैद है।