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देवता बनना है तो संतों व शास्त्रों की सुनो

3 वर्ष पहले
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आदमी जैसा सुनता है वैसा ही बोलता है। डॉक्टर भी कहते हैं जो बहरा होता है व गूंगा भी होता है। जब सुनेगा ही नहीं हो बोलेगा क्या। अगर देवता बनना है तो संतों की सुनो। शास्त्रों को पढ़ो और उनकी सुनो। राजस्थान के पुष्कर को बड़ा तीर्थ माना गया है। पूरी धरती पर ब्रह्माजी सिर्फ यहीं पूजे जाते हैं।

रोशनी में शनिवार से प्रारंभ हुई राम कथा में अंतरराष्ट्रीय कथा वाचक पं. श्याम स्वरूप मनावत ने यह श्रोताओं को यह सीख दी। उन्होंने कहा ब्रह्माजी ने मनुष्य से प्रश्न किया कि पहले बोलना शुरू किया या सुनना। मनुष्य ने कहा जन्म के पहले ही दिन से सुनना शुरू कर दिया था लेकिन बोलना दो साल बाद। इसके विपरीत आज मनुष्य पहले बोलता है और बाद में सुनता है। अगर जागना है तो कानों को खुला रखो। ईश्वर ने मनुष्य को सुनने के लिए दो कान, देखने के लिए दो आंख दी है लेकिन बोलने के लिए सिर्फ एक जुबान (जीभ) दी है। इसका कुछ तो कारण होगा। इसलिए पहले सुनो, देखो। इसके बाद जरूरी हो तो बोलो। पंडितजी ने श्रोताओं से प्रश्न किया कि गलती आंखें करें, हाथ या जुबान। क्षमा के लिए कान ही क्यों पकड़े जाते हैं। फिर स्वयं ही उत्तर देते हुए कहा तुमने संतों, शास्त्रों व महापुरुषों की सुन ली होती तो कान पकड़ने की नौबत नहीं आती। दुनिया तुम्हारे चरण पकड़ती। पंडितजी ने गुरु वशिष्ठ की कथा का उदाहरण देकर श्रोताओं से कहा कभी-कभी दुष्टों के साथ रहने से सज्जन भी फंस जाते हैं। अधर्म का साथ कभी नहीं देना चाहिए। अगर भरतजी बचपन में सत्संग में नहीं गए होतो तो कैकेयी के चक्कर में उलझकर राजगद्दी ले लेते। कथा शुभारंभ से पहले गांव में कलशयात्रा निकाली गई। इसमें सैकड़ों महिला-पुरुष शामिल हुए। यात्रा का गांव में जगह-जगह पुष्प वर्षा से स्वागत किया गया।

कलशयात्रा में सैकड़ों श्रद्धालु शामिल, कथा वाचक पं. श्याम स्वरूप मनावत ने कहा
रामकथा प्रारंभ होने से पहले गांव में कलश यात्रा निकाली गई।

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