शक्तिशाली होने का अर्थ यह नहीं कि गरीब को डराया जाए
भगवान राम ने गंगा किनारे पहुंचकर लक्ष्मण से कहा पार पहुंचने के लिए केवट से नाव मांग लो। लक्ष्मण ने कहा हम क्षत्रिय हैं। हमेशा देते हैं किसी से मांगते नहीं। मैं एक बाण से केवट की झोपड़ी के सामने अग्नि वर्षा कर देता हूं। वह बुझाने के लिए मेरे पास आएगा और मैं नाव मांग लूंगा। इस पर मर्यादा पुरुषोत्तम ने कहा शक्तिशाली होने का यह मतलब नहीं कि किसी गरीब को डराया जाए। अब हम ना क्षत्रिय हैं और ना राजकुमार। हम केवल वनवासी हैं। वनवासी को मांगने में शर्म कैसी। विनम्र बनकर हर काम किया जा सकता है। रोशनी में चल रही रामकथा के पांचवें दिन पं. श्याम स्वरूप मनावत ने श्रोताओं को स्वभाव में विनम्रता की सीख दी।
लक्ष्मण संवाद के माध्यम से श्रद्धालुओं को दी विनम्रता की सीख, पांचवें दिन पं. श्याम स्वरूप मनावत ने कहा
केवट ने दिखाई विनम्रता, माता सीता ने दिया कर्ज उतारने का वचन
पंडितजी ने कहा केवट ने तीनों को अपनी नाव से गंगा पार कराई। रामजी के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। उनकी आंखों में आंसू आ गए। यह देख सीताजी अपनी सुहाग कि निशानी अंगूठी देने लगी। केवट ने लेने से इनकार करते हुए कहा गरीब और अनपढ़ हूं लेकिन इतना बुरा नहीं कि सुहागन स्त्री की निशानी ही ले हूं। सीता माता ने केवट की प|ी के चरणों की धूल सिर पर रख कहा मैं यह ऋण लिए जा रही हूं। 14 साल बाद लौटाने का वचन देती हूं। अयोध्या लौटते समय वे केवट व उसकी प|ी को पुष्पक विमान में बैठाकर ले गए।
आएसएस प्रचारक व बीआरसी ने बुधवार को व्यास गादी का पूजन किया।
जन्म भूमि सबसे बड़ा तीर्थ
लंका मे युद्ध जीतने के बाद लक्ष्मण व वानर आपस में ठिठोली कर रहे थे कि अब लंका अब हम रख लेंगे और मेघनाथ का सुंदर महल रामजी के दे देंगे। इसी बीच राम आ गए और सब चुप हो गए। उन्होंने लक्ष्मण से पूछा क्या बात हो रही थी मुझे भी बताओ। पर कोई बताने को तैयार नहीं था। रामजी ने कहा जहां छोटों की हर बात सुनी जाती हैं वहीं से राम राज शुरू होता है। लंका में रावण को किसी बात की कमी नहीं थी लेकिन वह किसी की सुनता नहीं था। लंका भले ही सोने की क्यों ना हो लेकिन हमारी अयोध्या से बढ़कर नहीं हो सकती। इसीलिए कहा गया है- जननी जन्म भूमिश्च, स्वर्गादपि गरियसी...। अपनी जन्म भूमि किसी तीर्थ से कम नहीं होती।