एक विचार, भावना और लक्ष्य के साथ इकट्ठे हुए लोग समूह कहलाते हैं। समूह के सदस्यों में समझ काम करती है। यदि ऐसे ही लोग बिना समझ के स्वार्थ के साथ जुड़ जाएं तो भीड़ का रूप ले लेते हैं। समूह के पास सदैव यह संभावना बनी रहती है कि उसे एक अच्छा नेतृत्व मिल जाए। लेकिन, भीड़ के भाग्य में तो नेतृत्व भी ऐसा ही होता है, जो उसका दुरुपयोग ही करेगा। जीवन में जब भी मौका आए तो यह सावधानी जरूर रखिएगा कि आप समूह का हिस्सा बनने जा रहे हैं या भीड़ का? अगर आपने अपने घर में समूह के प्रयोग किए तो बाहर कभी भी भीड़ का हिस्सा नहीं बनेंगे। घर-परिवार में समूह को जोड़ने के लिए सामूहिक प्रार्थना बड़े काम की है। घर में कितने ही सदस्य हों पर चौबीस घंटे में एक बार साथ बैठकर प्रार्थना जरूर करिए। समूह के रूप में जब प्रार्थना की जाती है तो उसकी तरंगें बड़ी प्रभावी होती हैं। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं- किसी पुल पर जब फौजी गुजरते हैं तो उनकी परेड रोक दी जाती है, क्योंकि कदमताल यदि एक साथ हो तो उसका प्रभाव पुल पर पड़ सकता है, वह टूट सकता है। इसी प्रकार पुल से गुजरते समय तेज संगीत नहीं बजाया जाता, क्योंकि उसकी तरंगें सीमेंट और लोहे के बने पुल को भी भेद सकती हैं। यदि यही प्रभाव हम अपने परिवार में पैदा करें तो यहां परिणाम उल्टा आएगा और रिश्तों के सेतु मजबूत होंगे। क्योंकि रिश्तों के पुल सीमेंट-लोहे के नहीं होते, उनमें भावनाएं होती हैं। सामूहिक प्रार्थनाएं इन भावनाओं, संवेदनाओं को और मजबूत करेंगी।
पं. िवजयशंकर मेहता
humarehanuman@gmail.com