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गेहूं की कालाबाजारी व किसानों की कर्जमाफी में गड़बड़ी कर प्रबंधक बनता गया करोड़पति

3 वर्ष पहले
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सेवा सहकारी समिति बेरखेड़ी के प्रबंधक के पास काली कमाई कहां से आई। ये जानने के लिए लोकायुक्त पुलिस को कई साल पीछे जाना होगा। इन बीते सालों में प्रबंधक अशोक दुबे सरीखे समिति प्रबंधकों ने सरकार की नीतियों को अंगूठा दिखाते हुए कभी राशन के गेंहूं को बाजार में बेच दिया तो कभी फर्जीवाड़ा कर किसानों को खाद-बीज का कर्जदार बना दिया। दुबे के करीबियों के अनुसार बेरखेड़ी समिति में यह खेल कई वर्षों से चल रहा था। कुछ लोगों ने शिकायत भी की, लेकिन उन्हें दबा दिया गया। लोकायुक्त पुलिस अगर समिति के तहत आने वाले गांव के किसानों से जानकारी लेती है तो दुबे के संपत्ति जुटाने के तरीकों का खुलासा होने में समय नहीं लगेगा।

ऐसे बन जाते हैं कुछ हजार रुपए वेतन वाले करोड़पति

सहकारी समिति के प्रबंधकों का करोड़ों रुपए का आसामी निकल आना कोई नया मामला नहीं है। कुछ हजार रुपए वेतन पाने वाले ये लोग पहले भी लोकायुक्त पुलिस द्वारा पकड़े गए हैं। चार महीने पहले ही टीकमगढ़ में एक प्रबंधक के घर से करोड़ों रुपए की संपत्ति मिली थी। समितियों की वर्किंग के जानकारों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियां भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा केंद्र हैं। दरअसल इन समितियों के माध्यम से बीते कई दशकों से राशन की सामग्री का वितरण होता आया है। इसी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रबंधक, राशन दुकान के सेल्समैन से मिलीभगत कर कभी गेंहूं तो कभी शकर-घासलेट खुले बाजार में बेच देते थे। इसके अलावा ये समितियां किसानों को खाद-बीज भी बेचती है, लेकिन आधार कार्ड, मोबाइल रजिस्ट्रेशन जैसी सुविधाएं लागू होने से पहले इन समितियों द्वारा दी जाती है। जानबूझकर तीन-चार साल बाद वसूली की जाती थी ताकि किसान को डिफॉल्टर घोषित करने में सुविधा मिल जाए।

ऐसे बन जाते हैं कुछ हजार रुपए वेतन वाले करोड़पति

सहकारी समिति के प्रबंधकों का करोड़ों रुपए का आसामी निकल आना कोई नया मामला नहीं है। कुछ हजार रुपए वेतन पाने वाले ये लोग पहले भी लोकायुक्त पुलिस द्वारा पकड़े गए हैं। चार महीने पहले ही टीकमगढ़ में एक प्रबंधक के घर से करोड़ों रुपए की संपत्ति मिली थी। समितियों की वर्किंग के जानकारों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियां भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा केंद्र हैं। दरअसल इन समितियों के माध्यम से बीते कई दशकों से राशन की सामग्री का वितरण होता आया है। इसी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रबंधक, राशन दुकान के सेल्समैन से मिलीभगत कर कभी गेंहूं तो कभी शकर-घासलेट खुले बाजार में बेच देते थे। इसके अलावा ये समितियां किसानों को खाद-बीज भी बेचती है, लेकिन आधार कार्ड, मोबाइल रजिस्ट्रेशन जैसी सुविधाएं लागू होने से पहले इन समितियों द्वारा दी जाती है। जानबूझकर तीन-चार साल बाद वसूली की जाती थी ताकि किसान को डिफॉल्टर घोषित करने में सुविधा मिल जाए।

नकद लोन के नाम पर भी किया जाता है घपला

सहकारी समितियां किसानों को नकद राशि का भी लोन देती थी। सबसे बड़ा खेल इसी में होता है, दरअसल किसानों के नाम पर फर्जी लोन निकाल दिए जाते हैं। बाद में उनके नाम पर वसूली की जाती है। यह सारा घोटाला सरकार की आम कर्जमाफी के भरोसे किया जाता है। कर्जमाफी की घोषणा होते ही सारी रकम समिति प्रबंधक समेत कुछ अन्य लोगों मेंं बंटती है। हालांकि पिछले कुछ सालों से सरकार ने कर्जमाफी बंद कर दी है, इसलिए इस प्रवृत्ति मे कमी आई है।

गेहूं खरीदी केंद्र भी हैं कमाई के जरिया

समिति प्रबंधकों के पास हाल के कुछ साल में सरकारी गेहूं खरीद केंद्र, कमाई के नए अड्डे के रूप में सामने आए हैं। इन केंद्रों में किसान का गेहूं कम तौलने से लेकर व्यवसायियों का सड़ा-खराब गेहूं खरीदकर भी काली कमाई की जा रही है। किसानों को गेहूं खरीद के नाम पर पहले दो से तीन दिन केंद्र के बाहर खड़ा किया जाता है फिर जल्दी-जल्दी खरीदी के नाम पर उनका गेहूं कम तोलकर खरीदा जाता है।

कमाई के सारे सोर्स हमारी जांच के हिस्से हैं

इस मामले में लोकायुक्त एसपी सुनील कुमार तिवारी का कहना है कि फिलहाल हमारी टीम समिति प्रबंधक की अन्य संपत्तियों की खोजबीन में जुटी है। एक बार सारी जानकारी एकजाई होने के बाद प्रबंधक दुबे से इसका सोर्स पूछा जाएगा। उसने कहां से क्या कमाया, यह बताना उसकी जबावदेही है। हमारी टीम ने पूरी छानबीन के करने के बाद ही दुबे के खिलाफ कार्रवाई की है। उनमें उसकी काली कमाई के जरियों को भी देखा गया था।

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