12% कर भार की वजह से देशी घी में स्टॉकिस्ट लगभग बाहर
देशी घी के भावों में स्थिरता के साथ ग्राहकी भी ठंडी पड़ गई है। जीएसटी की वजह से घी का व्यापार छोटी डेरियों पर चला गया है। हालांकि डेरी वाले काफी ऊंचे भावों पर घी बेच रहे हैं। दूध पावडर में मांग सुस्त है। देशी घी पर 12% लगने से स्टॉकिस्ट लगभग बाहर हो गए हैं। छोटी डेरियां और प्लांट वालों की लागत में काफी अंतर होने से प्लांट वालों का घी बिकना कम पड़ गया है।
पूर्व के वर्षों में डेरी वाले बाजार से घी के टिन खरीदकर बेचते थे। वर्तमान में डेरियों पर जो दूध आ रहा है उससे डेरी वाले घी बनाकर बेच रहे हैं। डेरियों के घी पर 12% जीएसटी नहीं लगने का सबसे बड़ा लाभ मिल रहा है। पाइप लाइन खाली है, किंतु कोई भी व्यापारी स्टॉक करने को तैयार नहीं है। बड़ी कंपनियां आए दिन बटर और घी बेचने के टेंडर निकाल रही है। उपभोक्ता पैकिंग में घी बेचने वाले बटर की खरीदी कर लेती है। यदि बटर की क्वालिटी अच्छी बैठ जाती है तो लेवाल को फायदा हो जाता है।
मांग कमजोर
इंदौर में देशी घी में मांग का अभाव बना हुआ है। अब डेरी वालों की मांग भी नहीं है। गर्मी के सीजन में घी की खपत घट जाती है। खेरची में पारस 330 नोवा 340 हेरिटेज 350 डेरी प्योर 356 व्हाइट स्टार 373 अमूल 398 रुपए। डेरियों पर घी 440 से 500 रुपए से बेचा जा रहा है। दूध पावडर नोवा 174 रु. सागर 195 रु.।