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लोग उल्टे कामों में प्रवृत्त हो रहे हैं, इसीलिए दुखी हैं : मुनिश्री

4 वर्ष पहले
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वर्णी भवन मोराजी में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री विश्वयश सागर ने कहा कि इस धर्म प्रधान भारत देश में अनेक विद्वान हुए हैं। जो संस्कृति की रक्षा के लिए धर्म की चर्चा करते हैं।

उन्होंने रावण की दृढ़ प्रतिज्ञा की विवेचना करते हुए कहा कि रावण यद्यपि बहुत बलवान योद्धा था, फिर भी उसने अपनी पूर्व में की गई प्रतिज्ञा का पालन किया। जहां धर्म प्रभावना निरंतर होती रहती है, वहां की उन्नति भी निरंतर होती रहती है। उन्होंने कहा कि जन समुदाय अपनी मर्यादा में सदा रहते थे उनका आहार विहार सभी नियमानुसार होता था। जिससे उसका समूचा जीवन सुखमय व्यतीत होता था। लेकिन अब वर्तमान में वैसी स्थिति नहीं है। अनेक लोग विपरीत कार्यों में प्रवृत्त हो रहे हैं, इसी से दुखी होते है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है कि वह रात्रि में पानी पीने तथा भोजन करने का अवश्य त्याग करें। क्योंकि इसमें जीव हिंसा निश्चित होती है। कितने ही धर्मशास्त्र क्यों न पढ़ लिए जाएं पर यदि वह अपने जीवन में उसका आचरण नहीं करते तो धर्म अध्ययन व्यर्थ है।

उन्होंने कहा कि इस संसार में चारों गतियों में भ्रमण करते हुए कितना समय व्यतीत हो गया पर उसे आज तक सुख शांति नहीं मिली। इसलिए उत्तम पुरुषार्थ करो जिससे तुम्हारा कल्याण हो सके। धर्म धारण करने की क्रिया है जो कि स्वयं के पुरुषार्थ से की जाती है।

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