आजकल बाजारों में बिक रही नकली व मिलावटी खाद्य सामग्री और पेय पदार्थों के सेवन से कोई भी अछूता नहीं है। मिलावट के इस ज़हर से हमारा तन व मन दोनों खराब हो रहा हैं। उक्त विचार आर्यिका विज्ञानमति माता की शिष्या आर्यिका शरद मति माता ने वर्धमान कालोनी में विशेष रविवारीय प्रवचन के दौरान व्यक्त किए हैं। उन्होंने कहा कि ‘जैसा खाओगे अन्न , वैसा रहेगा मन ‘ वाली कहावत समाज में चरितार्थ हो रही है । दुर्लभता से प्राप्त होने वाली वस्तु की हम हमेशा कद्र करते हैं । जब किसी परिवार में शादी के लंबे समय बाद बेटा या बेटी का जन्म होता है तो उसे बहुत नाजो से पाला जाता हैं और उसके लालन पालन का तो बहुत ख्याल करते हैं किंतु संस्कारों की शिक्षा से दूर कर देते हैं । फिर उसको वही संस्कार मिलते हैं जो दोस्तों की संगत में मिलते हैं ।
आजकल हम बच्चों की खुशी के लिए तुरंत दस रूपये का नोट पकड़ा देते हैं , हम इस बात पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं कि वो बाजार से क्या खरीदकर खा रहे हैं , वह किन चीजों से मिलकर बना है । यही कारण है कि वो शारीरिक रूप से कमजोर व दूषित मानसिकता के शिकार हो रहे हैं ।
पहले तो सिर्फ मांसाहार से मिलकर ही चीजों का निर्माण होता था अब तो कैमिकल का ज़हर मिलाकर भी हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ हो रहा है । उन्होंने कहा कि बेटी को संस्कारित करोगे तो हमें वृद्धावस्था में सुख प्राप्त हो सकेगा ।
इसके पूर्व धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका सुयश मति मति माता ने कहा कि हम पैसे का संग्रह करने में लगे हैं और साथ पुण्य जाता है । व्यक्ति पचास वर्ष की आयु तक इतना कमा लेता है कि वो शेष उम्र भर बिना कुछ किए भी जीवन यापन कर सकता है । लेकिन वो चाहता कि मेरे बाद मेरा नाम मेरी आने वाली पीढिय़ां लेती रहे , वह इसी भ्रम में दो तीन पीढ़ियों के लिए संपत्ति जुटाने में अपने जीवन को ठिकाने लगा देता है।
धर्मसभा के पूर्व ब्रह्मचारिणी मोना दीदी ने मंगलाचरण किया । बाहर से आए अतिथियों ने आचार्य विद्यासागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन किया । संचालन नन्हें भाई शास्त्री अशोक अशोक वर्धमान ने किया ।