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संपत्ति कर: कौन भवन स्वामी और कौन किराएदार, नगर निगम के पास नहीं है लोगाें का सही रिकॉर्ड

3 वर्ष पहले
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नगर निगम में करीब एक साल पहले संपत्ति कर का कम्प्यूटराइज्ड डाटा तैयार किया गया था। इस रिकॉर्ड को गौर से देखें तो यह गलतियों का पुलिंदा नजर आता है। रिकॉर्ड में कहीं पर मकान मालिक का नाम गायब है तो कहीं पर किराएदार भर का नाम है। कुछ मामले ऐसे हैं, जिनमें नगर निगम ने मेनरोड से कई मीटर भीतर के मकान का टैक्स भी मैन रोड की प्रॉपर्टी के बराबर फीड कर दिया, जिसे संबंधित संपत्ति के मालिक जमा करने से कतरा रहे हैं। रिकॉर्ड सही नहीं होने के कारण नगर निगम को संपत्ति कर वसूली मेें लगातार घाटा हो रहा है। वहीं सम्पत्ति धारकों को नामांतरण, बैंक लोन सरीखे कामों में समस्या आ रही है।

केवल नोटबंदी के समय ही मिला लक्ष्य के मुताबिक टैक्स :

संपत्ति कर के डाटा की खामियों के चलते एक ओर नागरिक टैक्स जमा करने से बच रहे हैं। वहीं इससे नगर निगम को सालाना करोड़ों रुपए का घाटा हो रहा है। केवल साल 2016-17 भर में नगर निगम करीब 8 करोड़ रुपए का टैक्स जमा करा पाया था। हालांकि इसके पीछे मूल वजह नोटबंदी थी, जिसमें लोगों ने अप्रचलित घोषित किए गए नोटों को खपाने के लिए वर्षों पुराना टैक्स जमा कर दिया। लेकिन इसके पहले साल 2015-16 और बाद के साल 2017-18 में निगम इतना टैक्स नहीं वसूल पाया।

ई-नगर पालिका का डाटा पूरा नहीं मिलने के कारण बिगड़ी व्यवस्था : नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष अजय परमार का कहना है कि इस पूरी समस्या की जड़ नगर निगम के पास शहर की 55 हजार से ज्यादा संपत्तियों का सही डाटा नहीं होना है। साल 2011 में तत्कालीन महापौर किन्नर कमलाबाई ने ई- नगर पालिका कॉन्सेप्ट के तहत निगम के कम्प्यूटराइजेशन का पूरा काम विनोद प्रजापति की फर्म को दिया था। उसका काम था कि वह निगम की प्रत्येक शाखा को कम्प्यूटराइज्ड करने के साथ-साथ राजस्व शाखा के मैन्युअल बिल से कम्प्यूटराइज्ड बिल तैयार करे। प्रजापति के कर्मचारी ये काम करते रहे लेकिन एक साल पहले महापौर अभय दरे और फर्म से जुड़े संतोष प्रजापति का एक ऑडियो क्लिप को लेकर विवाद हुआ तो प्रजापति की फर्म से यह काम आनन-फानन में वापस ले लिया गया। नियमानुसार हैंड ओवर-टेक ओवर नहीं किए जाने के कारण फर्म से निगम को यह डाटा खुर्द-बुर्द स्थिति में मिला। बीच में दोबारा डाटा तैयार करने की जवाबदेही उपायुक्त आरपी मिश्रा को दी गई लेकिन उनके अधीनस्थ अमले ने भी रिकॉर्ड मेें कई खामियां छोड़ दीं। तभी से यह व्यवस्था गड़बड़ बनी हुई है।

केस-1 : किराएदार का नाम था, लेकिन मकान मालिक का नाम गायब
बड़ा बाजार में रहने वाले बिहारीलाल सोनी को अपने मकान का नामांतरण कराना था। वह संपत्ति कर जमा करने पहुंचे तो उनके वार्ड के रजिस्टर में उनके पिता का नाम ही नहीं था। लेकिन बाजू वाले कॉलम में किराएदार का नाम जरूर लिखा था। उन्होंने इस संबंध में राजस्व शाखा में संपर्क किया तो विभागीय कर्मचारियों ने उलटा जवाब दिया कि कोई बड़ी समस्या नहीं है आपको टैक्स भरना है तो आप पुराना बिल ले आइए। हम रिकॉर्ड सुधार लेंगे और आपसे टैक्स भी जमा कर लेंगे। सोनी ने जैसे-तैसे घर के पुराने कागजात निकाले और अपनी समस्या खुद ही सुलझाई।

केस-2 : ट्रस्ट का नाम नहीं, केवल किराएदारों का जिक्र
शहर के कुछ नामचीन ट्रस्टों की बेशकीमती प्रॉपर्टी का निगम के रिकॉर्ड में उल्लेख तो है लेकिन इसमें ट्रस्ट का नाम ही गायब है। केवल उनके किराएदारों के नाम दर्ज हैं। इस स्थिति में नगर निगम इन ट्रस्टों के सक्षम होने के बावजूद उनसे टैक्स नहीं वसूल पा रहा है। जानकारी के अनुसार यह स्थिति शहर के कृष्ण बिहारीजी मंदिर, जानकी रमण मंदिर, केशरबाई ट्रस्ट आदि की है।

भास्कर संवाददाता | सागर

नगर निगम में करीब एक साल पहले संपत्ति कर का कम्प्यूटराइज्ड डाटा तैयार किया गया था। इस रिकॉर्ड को गौर से देखें तो यह गलतियों का पुलिंदा नजर आता है। रिकॉर्ड में कहीं पर मकान मालिक का नाम गायब है तो कहीं पर किराएदार भर का नाम है। कुछ मामले ऐसे हैं, जिनमें नगर निगम ने मेनरोड से कई मीटर भीतर के मकान का टैक्स भी मैन रोड की प्रॉपर्टी के बराबर फीड कर दिया, जिसे संबंधित संपत्ति के मालिक जमा करने से कतरा रहे हैं। रिकॉर्ड सही नहीं होने के कारण नगर निगम को संपत्ति कर वसूली मेें लगातार घाटा हो रहा है। वहीं सम्पत्ति धारकों को नामांतरण, बैंक लोन सरीखे कामों में समस्या आ रही है।

केवल नोटबंदी के समय ही मिला लक्ष्य के मुताबिक टैक्स :

संपत्ति कर के डाटा की खामियों के चलते एक ओर नागरिक टैक्स जमा करने से बच रहे हैं। वहीं इससे नगर निगम को सालाना करोड़ों रुपए का घाटा हो रहा है। केवल साल 2016-17 भर में नगर निगम करीब 8 करोड़ रुपए का टैक्स जमा करा पाया था। हालांकि इसके पीछे मूल वजह नोटबंदी थी, जिसमें लोगों ने अप्रचलित घोषित किए गए नोटों को खपाने के लिए वर्षों पुराना टैक्स जमा कर दिया। लेकिन इसके पहले साल 2015-16 और बाद के साल 2017-18 में निगम इतना टैक्स नहीं वसूल पाया।

ई-नगर पालिका का डाटा पूरा नहीं मिलने के कारण बिगड़ी व्यवस्था : नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष अजय परमार का कहना है कि इस पूरी समस्या की जड़ नगर निगम के पास शहर की 55 हजार से ज्यादा संपत्तियों का सही डाटा नहीं होना है। साल 2011 में तत्कालीन महापौर किन्नर कमलाबाई ने ई- नगर पालिका कॉन्सेप्ट के तहत निगम के कम्प्यूटराइजेशन का पूरा काम विनोद प्रजापति की फर्म को दिया था। उसका काम था कि वह निगम की प्रत्येक शाखा को कम्प्यूटराइज्ड करने के साथ-साथ राजस्व शाखा के मैन्युअल बिल से कम्प्यूटराइज्ड बिल तैयार करे। प्रजापति के कर्मचारी ये काम करते रहे लेकिन एक साल पहले महापौर अभय दरे और फर्म से जुड़े संतोष प्रजापति का एक ऑडियो क्लिप को लेकर विवाद हुआ तो प्रजापति की फर्म से यह काम आनन-फानन में वापस ले लिया गया। नियमानुसार हैंड ओवर-टेक ओवर नहीं किए जाने के कारण फर्म से निगम को यह डाटा खुर्द-बुर्द स्थिति में मिला। बीच में दोबारा डाटा तैयार करने की जवाबदेही उपायुक्त आरपी मिश्रा को दी गई लेकिन उनके अधीनस्थ अमले ने भी रिकॉर्ड मेें कई खामियां छोड़ दीं। तभी से यह व्यवस्था गड़बड़ बनी हुई है।

डाटा को दुरुस्त कराने का काम जारी है, अन्य उपाय भी किए जा रहे हैं
Ãडाटा को दुरुस्त कराने के लिए राजस्व शाखा में लगातार काम किया जा रहा है, जो मामले सामने आते जा रहे हैं। उनका प्राथमिकता से निराकरण किया जा रहा है। यह डाटा हजारों की संख्या में है। इसलिए वक्त लग रहा है। नेता प्रतिपक्ष की अापत्ति के बाद नए सिरे से टैक्स निर्धारण किया जा रहा है। जिन लोगों के पास जमा टैक्स की पुरानी रसीदें नहीं हैं, उनके लिए स्व-कर निर्धारण योजना लागू की गई है। - अनुरागकुमार वर्मा, आयुक्त, नगर निगम सागर

भास्कर संवाददाता | सागर

नगर निगम में करीब एक साल पहले संपत्ति कर का कम्प्यूटराइज्ड डाटा तैयार किया गया था। इस रिकॉर्ड को गौर से देखें तो यह गलतियों का पुलिंदा नजर आता है। रिकॉर्ड में कहीं पर मकान मालिक का नाम गायब है तो कहीं पर किराएदार भर का नाम है। कुछ मामले ऐसे हैं, जिनमें नगर निगम ने मेनरोड से कई मीटर भीतर के मकान का टैक्स भी मैन रोड की प्रॉपर्टी के बराबर फीड कर दिया, जिसे संबंधित संपत्ति के मालिक जमा करने से कतरा रहे हैं। रिकॉर्ड सही नहीं होने के कारण नगर निगम को संपत्ति कर वसूली मेें लगातार घाटा हो रहा है। वहीं सम्पत्ति धारकों को नामांतरण, बैंक लोन सरीखे कामों में समस्या आ रही है।

केवल नोटबंदी के समय ही मिला लक्ष्य के मुताबिक टैक्स :

संपत्ति कर के डाटा की खामियों के चलते एक ओर नागरिक टैक्स जमा करने से बच रहे हैं। वहीं इससे नगर निगम को सालाना करोड़ों रुपए का घाटा हो रहा है। केवल साल 2016-17 भर में नगर निगम करीब 8 करोड़ रुपए का टैक्स जमा करा पाया था। हालांकि इसके पीछे मूल वजह नोटबंदी थी, जिसमें लोगों ने अप्रचलित घोषित किए गए नोटों को खपाने के लिए वर्षों पुराना टैक्स जमा कर दिया। लेकिन इसके पहले साल 2015-16 और बाद के साल 2017-18 में निगम इतना टैक्स नहीं वसूल पाया।

ई-नगर पालिका का डाटा पूरा नहीं मिलने के कारण बिगड़ी व्यवस्था : नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष अजय परमार का कहना है कि इस पूरी समस्या की जड़ नगर निगम के पास शहर की 55 हजार से ज्यादा संपत्तियों का सही डाटा नहीं होना है। साल 2011 में तत्कालीन महापौर किन्नर कमलाबाई ने ई- नगर पालिका कॉन्सेप्ट के तहत निगम के कम्प्यूटराइजेशन का पूरा काम विनोद प्रजापति की फर्म को दिया था। उसका काम था कि वह निगम की प्रत्येक शाखा को कम्प्यूटराइज्ड करने के साथ-साथ राजस्व शाखा के मैन्युअल बिल से कम्प्यूटराइज्ड बिल तैयार करे। प्रजापति के कर्मचारी ये काम करते रहे लेकिन एक साल पहले महापौर अभय दरे और फर्म से जुड़े संतोष प्रजापति का एक ऑडियो क्लिप को लेकर विवाद हुआ तो प्रजापति की फर्म से यह काम आनन-फानन में वापस ले लिया गया। नियमानुसार हैंड ओवर-टेक ओवर नहीं किए जाने के कारण फर्म से निगम को यह डाटा खुर्द-बुर्द स्थिति में मिला। बीच में दोबारा डाटा तैयार करने की जवाबदेही उपायुक्त आरपी मिश्रा को दी गई लेकिन उनके अधीनस्थ अमले ने भी रिकॉर्ड मेें कई खामियां छोड़ दीं। तभी से यह व्यवस्था गड़बड़ बनी हुई है।

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