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साल भर इंतजार के बाद मिली साइकिल, उसके लिए भी बहाना पड़ा पसीना

3 वर्ष पहले
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स्कूल शिक्षा विभाग की मनमर्जी और हीला-हवाली का नया मामला सामने आया है। सत्र 2017-18 के जिन विद्यार्थियों को साइकिल दी जाना थीं, वह उन्हें पूरे साल भर नहीं मिल सकीं। विद्यार्थी पढ़ाई पूरी कर अगली कक्षाओं में पहुंच गए, तब जाकर साइकिल मिलना शुरु हुईं। शिक्षा विभाग साइकिल तो दे रहा है, लेकिन इसमें भी वह विद्यार्थियों की कठिन परीक्षा ले रहा है। साइकिल लेने के लिए विद्यार्थियों को 25 किलोमीटर तक का सफर कराया जा रहा है। यह तस्वीरें, जिले के मालथौन विकासखंड की हैं। ब्लॉक की हाई स्कूल ललोई के विद्यार्थियों को शुक्रवार को साइकिल मिलीं। साइकिल स्कूल के बजाय मालथौन से बांटी गई। यानी गांव से 25 किलोमीटर दूर। कुछ विद्यार्थी स्वयं तो कुछ अपने अभिभावकों के साथ मालथौन पहुंचे। जब तक साइकिलें मिलीं तब तक दोपहर के 1.30 बज चुके थे। तापमान भी 38 डिग्री को छूने को था, और तेज धूप मानो चुभ रही थी। ऐसे में कई बच्चों ने अपनी साइकिलें बस की छत पर रखवा लीं और उसी से रजवांस तक आए, फिर वहां से 10 किलोमीटर ललाई तक चलाकर ले गए। जिनके पास पैसे नहीं थे या कमजोर तबके से थे, वे विद्यार्थी मालथौन से ललाेई तक ही 25 किलोमीटर साइकिल चलाते हुए आने को मजबूर हुए। चिलचिलाती धूप में पसीना बहाते हुए विद्यार्थी जब रास्ते में मिले तो उन्होंने बताया कि हमें तो यही कहा गया था कि साइकिल मालथौन में ही मिलेंगी, जो नहीं आएगा तो उसे नहीं मिल पाएंगी। इसलिए हम मालथौन ही आ गए।

बस पर साइकिल लादते हुए बच्चे। वहीं दूसरी तस्वीर में कुछ बच्चे कई किलोमीटर दूर तक साइकिल चलाकर ले गए।

भास्कर संवाददाता | सागर

स्कूल शिक्षा विभाग की मनमर्जी और हीला-हवाली का नया मामला सामने आया है। सत्र 2017-18 के जिन विद्यार्थियों को साइकिल दी जाना थीं, वह उन्हें पूरे साल भर नहीं मिल सकीं। विद्यार्थी पढ़ाई पूरी कर अगली कक्षाओं में पहुंच गए, तब जाकर साइकिल मिलना शुरु हुईं। शिक्षा विभाग साइकिल तो दे रहा है, लेकिन इसमें भी वह विद्यार्थियों की कठिन परीक्षा ले रहा है। साइकिल लेने के लिए विद्यार्थियों को 25 किलोमीटर तक का सफर कराया जा रहा है। यह तस्वीरें, जिले के मालथौन विकासखंड की हैं। ब्लॉक की हाई स्कूल ललोई के विद्यार्थियों को शुक्रवार को साइकिल मिलीं। साइकिल स्कूल के बजाय मालथौन से बांटी गई। यानी गांव से 25 किलोमीटर दूर। कुछ विद्यार्थी स्वयं तो कुछ अपने अभिभावकों के साथ मालथौन पहुंचे। जब तक साइकिलें मिलीं तब तक दोपहर के 1.30 बज चुके थे। तापमान भी 38 डिग्री को छूने को था, और तेज धूप मानो चुभ रही थी। ऐसे में कई बच्चों ने अपनी साइकिलें बस की छत पर रखवा लीं और उसी से रजवांस तक आए, फिर वहां से 10 किलोमीटर ललाई तक चलाकर ले गए। जिनके पास पैसे नहीं थे या कमजोर तबके से थे, वे विद्यार्थी मालथौन से ललाेई तक ही 25 किलोमीटर साइकिल चलाते हुए आने को मजबूर हुए। चिलचिलाती धूप में पसीना बहाते हुए विद्यार्थी जब रास्ते में मिले तो उन्होंने बताया कि हमें तो यही कहा गया था कि साइकिल मालथौन में ही मिलेंगी, जो नहीं आएगा तो उसे नहीं मिल पाएंगी। इसलिए हम मालथौन ही आ गए।

स्कूल प्रबंधन का काम

है साइकिल ले जाना
Ãसाइकिल सामग्री विकासखंड मुख्यालय पर आती है। यहां ठेकेदार द्वारा असेंबल कर साइकिल तैयार की जाती हैं। इसके बाद बीईओ को हैंडओवर कर दी जाती हैं। फिर वहां से स्कूल प्रबंधन अपने संस्थान में ले जाता है। साइकिल विकासखंड मुख्यालय से न बांटकर स्कूल में ही बांटने का नियम है। यदि किसी ने विद्यार्थियों को 25 किलोमीटर दूर तक बुलाया है तो यह गलत है। इसकी जांच करवाकर दोषी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। - संतोष शर्मा, डीईओ सागर

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