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संगोष्ठी: संत कंवरराम ने दिखाया कर्तव्य पथ, कर्म त्याग का मार्ग

3 वर्ष पहले
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संगोष्ठी: संत कंवरराम ने दिखाया कर्तव्य पथ, कर्म त्याग का मार्ग

सागर |
संतकंवरराम जयंती पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें सिंधी समाज के वक्ताओं ने

संत कंवर राम की जीवनी पर डालते हुए बताया कि संत 13 अप्रैल 1885 ईस्वी को बैसाखी के दिन सिंध प्रांत के सक्खर जिले के मीरपुर माथेलो तहसील के जरवार गांव में हुआ था। इनके पिता ताराचंद और माता तीर्थ बाई प्रभु भक्ति एवं हरि कीर्तन करके संतोष और सादगी से अपना जीवन व्यतीत करते थे। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए मुकेश हरयानी ने बताया कि सिंध के परम संत खोताराम साहिब के आशीर्वाद से ताराचंद को पुत्र र| की प्राप्ति हुई जिसका नाम ‘कंवर’ रखा गया। कंवर का अर्थ है ‘कंवल’ अर्थात कमल का फूल।

राजेश मनवानी ने बताया नामकरण के समय संत खोताराम साहिब ने भविष्यवाणी की कि जिस प्रकार कमल का फूल तालाब के पानी और कीचड़ में खिलकर दमकता रहता है वैसे ही इस जगत में ‘कंवर’ भी निर्मल, विरक्त होगा और सारे विश्व को कर्तव्य पथ, कर्म, त्याग और बलिदान का मार्ग दिखाएगा। राजेश हरजानी ने बताया बाल्यावस्था से ही संत कंवर रामजी की रूचि ईश्वर भक्ति और भजन कीर्तन में थी। उनके मधुर स्वर की गूंज गांव के आस-पास हर जगह फैली हुई थी। उनकी माता उन्हें चने उबाल कर बेचने के लिए देती थीं। वह अपने मधुर स्वर से गाते, आवाज लगाते हुए चने बेचा करते थे।

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