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ये हैं सागर के पानीदार लोग; इनसे सीखें पानी को सहेजना, बचाना और बांटना

3 वर्ष पहले
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राजघाट बांध से वाटर सप्लाई के पहले तक पानी के लिए रतजगा करने वाले इस शहर में अब पानी की बर्बादी के किस्से कहे और सुने जाते हैं। इस बीच शहर के कुछ लोग अलग-अलग तरह से जलसेवा कर रहे हैं। कोई 25 साल से प्याऊ चला रहा है तो कोई जल संरक्षण, पानी की बर्बादी रोकने का काम कर रहा है। अाप भी मिलिए शहर के इन पानीदार लोगों से। जरूरत है इनसे प्रेरणा लेकर शहर से कुछ और लोग आगे आएं तो शहर को पानीदार बनाया जा सकता है।

भास्कर सरोकार

आज बचाएं जल

पानीदार कल

पानी के लिए रतजगा करने वाले सागर शहर में अब लोग पानी का अपव्यय भी खूब करने लगे हैं, ऐसे में मिसाल हैं कुछ ऐसे चेहरे जो जलसेवा में जुटे हैं

लोगों को प्यास से दम तोड़ते देखा तो लग गए जलसेवा में

ये 78 वर्षीय किशनलाल पाहवा हैं। जलसेवक रूप में इनकी दूर-दूर तक ख्याति रही है। पाकिस्तान से हिंदुस्तान आते समय इन्होंने प्यास से दम तोड़ते लोगों का भयावह मंजर अपनी आंखों से देखा है। तभी से उनमें जलसेवा की अलख जागी थी। सागर में रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म नंबर- 1 पर 1994 में प्याऊ शुरू की। इस पुण्य कार्य में लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। ट्रेनों में सफर करने वालों को कई बार गर्मी के सीजन में स्टेशन पर ठंडा पानी नसीब नहीं होता। इस प्याऊ से काफी राहत मिलती है।

जहां इंजीनियरिंग फेल वहां अकील की जुगाड़ से पानी सप्लाई

ये हैं निगम के जलप्रदाय विभाग के पंप चालक अकील खान। इनका पद बहुत छोटा, लेकिन काम इंजीनियरों से भी बढ़कर है। राजघाट पाइप लाइन के पूरे नेटवर्क की जानकारी इनके पास है। वाटर सप्लाई में जब भी कहीं कोई फाल्ट आता है। सबसे पहले अकील से ही बात की जाती है। एेसे कई मौके आए जब पाइप लाइन में बड़े लीकेज, एयर व स्कॉवर वॉल्व क्षतिग्रस्त हुए। ऐसे में निगम के इंजीनियर व अफसरों को अकील की तरफ ताकते देखा गया। उनकी जुगाड़ से कई बार शहर पानी के संकट से बचता रहा है।

देखी नहीं गई पानी की बर्बादी, चल पड़े नलों में टोटियां लगाने

ये हैं सागर के इंजीनियर प्रकाश चौबे। पेशे से बिल्डर हैं, लेकिन कुछ सालों से समाजसेवा में रम गए हैं। शहर में जहां तहां पाइप लाइनों व नलों से पानी बहता देख इनसे रहा नहीं गया। पिछले साल खुद ही अपने खर्चे पर टोटियां लेकर नलों में लगाने पहुंच गए। नगर निगम की मदद और जनभागीदारी से 1500 टोंटियां लगवाईं। अपनी कॉलोनियों के अलावा शहर में जहां जैसा अवसर मिलता है वे लोगों को पानी बचाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हम पानी बना नहीं सकते बचा तो सकते हैं। वे इस साल भी अपना टोंटी लगाने का अभियान शुरू करने वाले हैं।

25 साल से वाटर रि-चार्जिंग पर कर रहे हैं काम, सरकार ने बाद में अपनाई तकनीक

यह है शहर के जियोलॉजिस्ट सुबोध ताम्रकार। 25 साल पहले इन्होंने वाटर रि-चार्जिंग पर काम शुरू किया था। जिलेभर में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग, वाटरशेड और प्लांटेशन पर काम कर रहे हैं। बरसाती पानी से भूजल सुधार की दिशा में सबसे पहले 1994 में काम शुरू कर दिया था, उस समय सरकार तक ने इस दिशा में नहीं सोचा था। 2006 में शासन ने नए बनने वाले मकानों में रुफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अनिवार्य किया। जिन लोगों ने इस तकनीक को अपनाया है, उनके बोर अब गर्मियों में भी नहीं सूखते।

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