पवित्र रमजान-उल-मुबारक माह के पहले जुमा (शुक्रवार) की नमाज जामा मस्जिद में पढ़ी गई। रमजान माह में इसका कुछ ज्यादा महत्व रहता है।
यह और बात है कि अब नमाजियों की संख्या अधिक होने के कारण लोगों को जामा मस्जिद में जगह नहीं मिली। अन्य मस्जिदों में भी नमाज पढ़ी गई। रमजान के दूसरे दिन शुक्रवार को मुस्लिम धर्मावलंबियों ने पूरी शिद्दत के साथ रोजा रखा। दूसरा रोजा सेहरी से इफ्तारी होने तक 15 घंटे 11 मिनट का था, दोपहर के वक्त गर्मी का आलम यह था कि तापमान 43.2 डिग्री तक पहुंच गया था। बावजूद इसके गर्मी न तो रोजेदारों के रोजे में खलल डाल सकी और न इबादत में। नमाज के बाद बंदों ने खुदा से सभी पर रहमत व बरकत नाजि़ल करने के लिए दुआ मांगी। रोजे की शुरुआत अलसुबह हुई, समापन शाम को इफ्तार के साथ हुआ।
माहे रमजान के दूसरे दिन जुमा होने के कारण कई बड़ी मस्जिदों में विशेष नमाज अता की गई । उम्मीद है कि ईद 16 या 17 जून को मनेगी। इस स्थिति में इस बार माहे रमजान में पांच जुमा होंगे। इसके पूर्व लगातार दो वर्षों में रमजान में 4 चार जुमा ही रहे। मुस्लिम समाज के लोगों ने शुक्रवार को दूसरा रोजा रखा। इनमें महिलाएं, युवा और किशोर भी शामिल थे। अधिकांश लोग सेहरी करने जाग गए । तड़के 3.54 बजे रोजे की शुरुआत हो गई थी।
तरावीह
शहर की जामा मस्जिद सहित अन्य मस्जिदों में तरावीह और कुरान की तिलावत का सिलसिला चलता रहा। लोगों ने नमाज के साथ अमनो-अमान, रहमत और बरकत के लिए दुआ की। कई स्थानोें पर मजलिसे हुईं। इनमें मौलवियों ने लोगों को रमजान के महत्व और रोजे रखने के तौर-तरीकों पर रोशनी डाली।
अकीदत के पल
इस्लामिक कैलेंडर का 9वें महीने का नाम रमजान-उल-मुबारक है। यह महीना बुराइयों से बचने और अपने आमाल को सुधारने की नसीहत देता है। हर बंदे को रोजा रखना अनिवार्य है। अल्लाह फरमाता है ऐ ईमान वालों तुम पर रोजों को फर्ज किया गया है। जिस तरह तुमसे पहले लोगों पर रोजे को फर्ज किया गया था ताकि तुम मुतक्की हो जाओ। रोजा फर्ज किया ताकि इंसान अल्लाह के डर से गुनाह को छोड़ दे। रोजे में भूखा और प्यासा रखकर इस बात की मसल कराई जाती है कि इंसान की अकल इंसान की नफ्सािनियत पर हाबी हो और इंसान कोई भी काम करने से पहले सोचना शुरू करे।
मुफ्ती अबरार अहमद
सूरह बकरह आथत -183-
इफ्तार 19 मई
शाम 6.56 बजे
रोजे का वक्त
सेहरी 20 मई
सुबह 3.54 बजे