राष्ट्रीय बालभवन के कैलेंडर में सागर बालभवन के दो बाल चित्रकारों के चित्रों को पहली बार जगह मिली है। बालभवन की इन छात्राओं द्वारा उकेरे गए दोनों चित्र भारत की पारंपरिक चित्रकला मधुबनी और वारली चित्रकला पर आधारित है। बाल दिवस के मौके पर इन चित्रों को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय बालभवन भेजा गया था।
सहायक संचालक रोहित बड़कुल ने बताया ऐसा ऐसा पहली हुआ जब सागर बालभवन के दो चित्रों को राष्ट्रीय बालभवन के कैलेंडर में स्थान मिला हो। बालभवन की छात्रा सुनिधि बेहरे ने वारली चित्रकला और अनिशा रोहित ने मधुबनी चित्रकला पर केंद्रित आकर्षक चित्र बनाए थे। दोनों को इस उपलब्धि पर भोपाल बालभवन के संचालक, संयुक्त संचालक, उपसंचालक महिला बाल विकास सागर ने बधाई दी हैं।
जानिए क्या है मधुबनी चित्रकला : मधुबनी पेंटिंग भारत और विदेशों में सबसे प्रसिद्ध कलाओं में से एक है. इस चित्रकला की शैली को आज भी बिहार के कुछ हिस्सों में प्रयोग किया जाता है, खासकर मिथिला चूंकि मिथिला क्षेत्र में इस पेंटिंग की शैली की उत्पत्ति हुई है, इसलिए इसे मिथिला चित्रों के रूप में भी जाना जाता है. समृद्धि और शांति के रूप में भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इन कलाओं की इस अनूठी शैली का इस्तेमाल महिलाएं अपने घरों और दरवाजों को सजाने के लिए किया करती थी। मधुबनी का अर्थ है शहद का जंगल. यह चित्रकारी मधुबनी की स्थानीय कला है, इसलिए इसका नाम मधुबनी पेंटिंग पढ़ा. यह कला प्रकृति और पौराणिक कथाओं की तस्वीरों विवाह और जन्म के चक्र जैसे विभिन्न घटनाओं को चित्रित करती है। बाल भवन की 15 वर्षीय अनिशा रोहित के मधुबनी आर्ट पर केंद्रित चित्र को राष्ट्रीय बाल भवन के 12 पेज के कैलेंडर में लिया गया है।
वारली चित्रकला भी
जनजाति की देन
वारली एक प्रकार की जनजाति है। जो महाराष्ट्र के ठाणे जिले के धानु, तलासरी एवं जवाहर में दूसरी जनजातियों के साथ रहती है। वारली चित्रकला प्राचीन भारतीय कला है जो की महाराष्ट्र की जनजाति वारली द्वारा बनाई जाती है। और यह कला उनके जीवन के मूल सिद्धांतों को प्रस्तुत करती है। इन चित्रों में मुख्य रूप से फसल पैदावार ऋतु, शादी, उत्सव, जन्म और धार्मिकता को दर्शाया जाता है। यह कला वारली जनजाति के सरल जीवन को भी दर्शाती है। वारली कलाओं के प्रमुख विषयों में शादी का बड़ा स्थान हैं। शादी के चित्रों में देव, पलघाट, पक्षी, पेड़, पुरुष और महिलाएं साथ में नाचते हुए दर्शाए जाते हैं। 15 साल की सुनिधि बेहरे बाल भवन में वारली चित्रकला पर आधारित चित्र बनाया था जिसे राष्ट्रीय कलेंडर में जगह मिली है।