छत्तीसगढ़ म मनाथे संगवारी
बारो महीना तिहार।
दिन भर उपास रहिथे
अउ संझौती करथे फरहार।।
किसम किसम के रोटी पीठा
नुन्हा त कतको गुरहा।
रंग घलो सादा पिंवरा
कईठन चेम्मर गुजगुजहा।।
चीला रोटी अड़बड़ लुदलुदही
जुड़ाय म अंटियाथे।
गरम गरम खाबे त
बंगाला चटनी संग म मीठाथे।।
ठेठरी रोटी गोलवा लमहरी
तीजा पोरा के चिन्हा आय।
खुरमी बना ले तीली डार के
दोनों संग बिकट मिठाय।।
पितरहा बरा ल का कहिवे संगी
दही संग म खाले।
गुलगुल फजिया गहूं पिसान के,
मस्कुरा म दबाले।।
खोंटवा देहरौरी एके बरोबर,
बरा के मुहरन दिखथे।
चाउर पिसान के अइरसा हा,
गुड़ के पाघ म लपटथे।।
चौंसेला ह चक चक ले पड़रा,
फरा सही ऐखर रंग।
अंगाकर रोटी सरी दिन बनथे,
छत्तीसगढ़िया मनके संग।।
भजिया अउ सोंहारी के,
कोनो खास नइये तिहार।
सगा नेवता करे बर,
बारो महीना बनथे बारम्बार।।