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जिसके पास प्रेम धन है वह निर्धन कभी नहीं हो सकता: केशव देव

3 वर्ष पहले
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सुदामा से परमात्मा ने मित्रता का धर्म निभाया। राजा के मित्र राजा होते हैं, रंक नहीं। पर परमात्मा ने कहा कि मेरे भक्त जिसके पास प्रेम धन है वह निर्धन नहीं हो सकता। कृष्ण और सुदामा दो मित्रों का मिलन ही नहीं जीव व ईश्वर औ भक्त व भगवान का मिलन था। जिसे देखने वाले अचंभित रह गए थे। आज मनुष्य को ऐसा ही आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। उक्त उद्गार कंचनपुर इलाके के गांव कुर्रेंदा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम दिन भक्तों को प्रवचन देते हुए कहीं।

भागवताचार्य केशवदेव ने कहा कि कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज कहां है। यही कारण है कि आज भी सच्ची मित्रता के लिए कृष्ण.सुदामा की मित्रता का उदाहरण दिया जाता है। द्वारपाल के मुख से पूछत दीनदयाल के धाम, बतावत आपन नाम सुदामा, सुनते ही द्वारिकाधीश नंगे पांव मित्र की अगवानी करने पहुंच गए। लोग समझ नहीं पाए कि आखिर सुदामा में क्या खासियत है कि भगवान खुद ही उनके स्वागत में दौड़ पड़े। श्रीकृष्ण ने स्वयं सिंहासन पर बैठाकर सुदामा के पांव पखारे। कृष्ण.सुदामा चरित्र प्रसंग पर श्रद्धालु भाव.विभोर हो उठे।

उन्होंने आगे कहा कि श्रद्धा के बिना भक्ति नहीं होती। विशुद्ध हृदय में ही भागवत टिकती है। भगवान के चरित्रों का स्मरण, श्रवण करके उनके गुण, यश का कीर्तन, अर्चन, प्रणाम करना, अपने को भगवान का दास समझना, उनको सखा मानना तथा भगवान के चरणों में सर्वश्व समर्पण करके अपने अंतरूकरण में प्रेमपूर्वक अनुसंधान करना ही भक्ति है।

श्रीकृष्ण को सत्य के नाम से पुकारा गया। जहां सत्य हो वहीं भगवान का जन्म होता है। भगवान के गुणगान श्रवण करने से तृष्णा समाप्त हो जाती है। परमात्मा जिज्ञासा का विषय है, परीक्षा का नहीं। भागवत कथा के समापन पर कथा परीक्षित संत उमेदानंद के द्वारा व्यासपीठ की आरती उतारी गई। कथा समापन पर सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया गया। भागवत आयोजकों ने बताया कि शनिवार को सभी ग्राम वासियों की तरफ से विशाल भंडारे का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें हजारों की तादात में श्रद्धालु प्रसादी ग्रहण करेंगे। भंडारे की व्यवस्था के लिए आसपास के गांवों के ग्रामीणों को प्रसादी परोसने की व्यवस्था सौंपी गई है।

मां होती है बच्चे की पहली पाठशाला

धौलपुर। अग्रवाल महिला मंडल कोठी एवं अग्रसेन क्लब की संयुक्त तत्वावधान में पुरुषोत्तम मास के पर सत्यनारायण कथा एवं मातृ दिवस का आयोजन हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत महाराज अग्रसेन की महाआरती के साथ हुई। कार्यक्रम में जिले में बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ की ब्रांड एंबेसडर मधु गर्ग मुख्य अतिथि थीं। विशिष्ट अतिथि जिलाध्यक्ष एवं समाजसेवी रजनी मोदी थी। इस मौके पर केक काटकर मातृ दिवस मनाया गया। मुख्य अतिथि गर्ग ने कहा कि मां बच्चे की प्रथम पाठशाला होती है। विशिष्ट अतिथि मोदी ने पुरुषोत्तम मास की महिमा बताते हुए कहा कि इस मास में किए जाने वाले कार्यों का फल दस गुना मिलता है, इसलिए हमें किसी को भी नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए।

सैंपऊ. पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं की भीड़।

गुरु वह जिसके जरिए ही जीवन का कल्याण हो

चौथे दिन गुरु एवं शिष्य का बताया महत्व

भास्कर संवाददाता|बाड़ी

लोकेश आनंद महाराज अवधूत द्वारा सत्यनारायण धर्मशाला बाड़ी में प्रवचन के चौथे दिवस गुरु एवं शिष्य के ऊपर अपने प्रवचन देते हुए भक्तों से कहा कि गुरु सगुण और निर्गुण दोनों रूप में विद्यमान होते हैं। गुरु का जीवन में होना उतना ही आवश्यक है जितना परमपिता परमात्मा का। क्योंकि बिना गुरु के परमपिता परमात्मा का मिलना मुश्किल होता है। सगुण रूप में गुरु के अनेक रुप हैं। आप जो भी देखते हैं। जहां से भी आपको कुछ अच्छा मिलता है सगुणरूपी गुरु कहलाता है। निर्गुण रूपी गुरु के रूप में वे तत्व आते हैं, जो साकार रूप में दिखाई नहीं देते, लेकिन फिर भी हमारे कल्याण में सहायक होते हैं। यह समस्त सृष्टि, प्रकृति साक्षात निर्गुण रूपी गुरू हैं। जिनसे हमें जीवन यापन के लिए बहुत कुछ मिलता है। वर्तमान में यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि हम गुरू किसे बनाएं। क्योंकि गुरू वह होता है, जिसके द्वारा हम अपने जीवन का कल्याण करते हैं। इसलिए गुरु रूपी तत्व की पहचान करना विशेष जरूरी होता है। गुरु वही है जो हमारा कल्याण कर सके। गुरु बनाते समय हमें गुरु की तपस्या और ज्ञान को आधार मानकर सच्चे गुरु की पहचान करनी चाहिए।

बाड़ी. प्रवचन करते संत लोकेशानंद।

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