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भीतर से सुलझे हैं तो रोग से निपट सकेंगे

3 वर्ष पहले
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मनुष्य की जिं़दगी में उलझनों की कोई कमी नहीं है। एक से निपटो तो दूसरे में अटक जाओगे। पर ध्यान रखें खुद से कभी नहीं उलझें। यदि स्वयं से उलझ गए तो शायद सुलझा नहीं पाएंगे। वैसे जो लोग खुद में उलझ जाते हैं उनको सुलझाने का काम कोई गुरु ही कर सकता है। लोग जीवन में गुरु को प्रवेश ही इसलिए देते हैं। उलझन की स्थिति में गुरु एक मंत्र देता है और वह मंत्र फिर उपचार करता है। सारा संसार विश्व स्वास्थ्य दिवस भी मनाता है। इसके पीछे उद्‌देश्य यही है कि बीमारी आने से पहले ही रोक ली जाए। जब हम खुद से उलझते हैं तो अपने व्यक्तित्व की अच्छाइयों को नकारने लगते हैं। हमारी शारीरिक शक्ति कमजोर होने लगती है। बाहर के वातावरण में जो बीमारियां घूम रही हैं उनके आक्रमण को सहने में शरीर कमजोर हो जाता है और आदमी बीमार पड़ जाता है। यह बिल्कुल सही है कि तन की बीमारी को मन और बढ़ा देता है। जो लोग मन पर टिके हैं वो खुद में उलझते भी बहुत हैं। इसलिए कोशिश की जाए कि जब भी उलझने का मौका आए, कोई गुरु या मंत्र का सहारा लें। भीतर से यदि सुलझे हुए हैं तो बाहर जो भी बीमारी आएगी, आप समझदारी से उसका सामना कर सकेंगे। आज लोगों की जो जीवनशैली है उसमें शरीर को बीमार होने के अनेक अवसर हैं। बेहतर यही है कि बाहर जो भी सावधानियां रखें, पर भीतर से पहले ही उस बीमारी को रोक लिया जाए। तब शायद गंभीर से गंभीर बीमारी भी बड़ा नुकसान नहीं कर पाएगी।



पं. िवजयशंकर मेहता

humarehanuman@gmail.com

जीने की राह कॉलम पं. विजयशंकर मेहता जी की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें JKR और भेजें 9200001164 पर

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