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सरकारी केसों की संख्या घटाने अब नई नीति पर अमल

3 वर्ष पहले
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सरकारी विभागों से संबंधित न्यायालयीन प्रकरणों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे प्रकरणों में मुकदमेबाजी से न्यायालयों में भी काम का बोझ बढ़ रहा है। मुकदमेबाजी रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने मप्र राज्य मुकदमा प्रबंधन नीति बनाई है। इसी नीति के तहत लंबित प्रकरणों को कम करने और नए प्रकरणों में जल्द निराकरण की पहल की जाएगी। इसके लिए अब हर सरकारी विभागों में शिकायती निवारण फोरम स्थापित किए जाएंगे। मुकदमों का प्रबंधन एवं संचालन समन्वित, समयबद्ध तथा सशक्ति रीति में किया जाएगा। इस नीति के तहत लंबित प्रकरणों की समय सीमा पर छानबीन कर निष्फल तथा तुच्छ प्रकरणों को वापस लिए जाने का प्रयास होगा। शेष प्रकरण जो वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र यानी मध्यस्थता, लोक अदालत आदि के सहारे हल किए जाएंगे। इससे लंबित प्रकरणों की संख्या में कमी आएगी।

विधिक प्रकोष्ठ की स्थापना होगी : विभिन्न विभागों में दिन प्रतिदिन के कार्यों के संबंध में जारी किए गए प्रशासनिक आदेशों को अक्सर न्यायालयों में चुनौती दी जाती है। ऐसे मुकदमों को कम करने के लिए प्रशासनिक आदेशों को सुसंगत अधिनियमों, नियमों, अधिसूचनाओं तथा न्यायिक निर्णयों के अनुरूप बनाया जाएगा। सभी विभाग के लंबित न्यायालयीन प्रकरणों का प्रबंधन तथा न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन के लिए कार्रवाई करना जरूरी होता है, उसमें अलग से अनुभवी न्यायिक सेवा के अधिकारी या विधिक पृष्ठ भूमि के अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे।

नई नीति

मुकदमों को कम करने के लिए प्रशासनिक आदेशों को सुसंगत बनाने की पहल शुरू

एक कर्मचारी की व्यस्तता व हजारों का खर्च

जिले के 27 विभागों में से 15 विभाग ऐसे हैं जिनके विवादास्पद मामले हाईकोर्ट में चल रहे हैं। हाईकोर्ट में जबाव-दावा पेश करने व तारीखों पर सरकारी वकील से शासन पक्ष की उपस्थिति दर्ज कराने के लिए एक कर्मचारी कोर्ट पेशी के काम में ही लगा रहता है। कर्मचारी के मुख्यालय से हाईकोर्ट तक जाने-आने व उसको दिए जाने वाले भत्तों पर शासन का हजारों रुपए बर्बाद हो रहा है। मुकदमों की संख्या में कमी आने से जिले में ही हर साल पांच लाख रुपए से अधिक बजट व्यय होता है। नई व्यवस्था से सरकारी खर्च में कमी लाई जा सकेगी।

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